घरती धन न अपना
जगदीठाचनद्र _ परती _ धन
लिंक हक _ छपना _
राजकवान पटना« दर
सोम आनद को
जिनके सहयोग ने
मेरी सो रही सुजन-चेतन को पुनर्जागृत करके
यह उपयास लिखने
के लिए प्रेरित किया
मेरी ओर से
भेरा यह उपन्यास मेरी क्शितरावस्था को कुछ जविस्मरणीय स्पृतियां और उनके दामन म॑ छिपी एक अदम्य वेदला वी उपज है।
मेरी किशोरावस्था मेरे ननिहाल के गाव रल्हून (पंजाब) मे बीती ) गाँव का एक हरिजन परिवार मेरे नानाजी थी जस्तीन जोतता था और इसी सिलसिले मे मुझ उनकी बस्ती मे जाना पड़ता था। हरिजना की बस्ती म॑ जाने पर कोई पावदी ता ने थी परल्तु कुछ मर्योदाएँ थी, कुछ परम्पराएँ और सीमाएँ थी जिनम बेंधकर ज़रूर चुलना पडता था ! गाव का दोहिंत होने के कारण मुझसे इन मर्या
दाभा वा कडाई से पालन करने की अपेसा की जाती थी । भेरा किशोर मन बघना की इस झीनी-सी दीवार को तांडकर हरिजता वी छोटी छोटी सीलन भरी अंधेरी कीठरिया मे छिप्रे रहस्यो को जानने के लिए हरदम व्यग्न रहता था | लोगा की आँख बचाकर मैं उनमे गया भी और मन भर कर मैंने उन बधना को तोड़ा । गाँव म॑ चछ रहे इस भेदभाव को देखकर मेरे क्शोर मन भ विद्राह की ज्वालाएं भड़क उठी। परन्तु इहे अभिव्यक्ति दने का कोई माग दिखाई व देता था| उपयास लिखने जसी किसी चीज़ से तो में बिलकुल ही परिचित नहीं था ।
इसी दोशन पढाई बोर बाद म॑ नोकरी दे सिलसिले भ मुझे शहर जाना पड्य परतु व में एकाप्व बार छुट्टिया मे मुझे अपने ननिहालू जाने का भी अवसर मिलता रहता । मैं हर साल यही देखता कि गाँव मे भर्यादाओ को सीमाएँ टूटनी तो दर रहो, उनकी जकड़न दिनोदिन सख्त होतो जा रही है | अथशास्त्र का छात्र होते के कारण मुझे इस सामाजिक दुर्वस्था के पीछे छिपे आथिक कारणा वा भी **'
पता चलो लगा । मैं यह सब देखवर वहुत ही उद्विन होता था वि आथिक अभावा वी चफ्ती मे युगयुगातरां सं पिस रहे हरिणन अब भी मध्यकश्ालीन यातनाआ को भोग रह हैं। जिम्त भूमि पर थे रहते थे जिस जमीन को वे जोतत थ यहाँ तवा वि जिन छप्परा में मे रहत थे, कुछ भी उनवा नहीं था। हही बाता का दयकर मंरे किशोर मन वी वेदना सहसा अपने सभी बाँध तोडबर फूट सिकली और मैंने उपशित हरितना व” जीवन का चित्रण करने का सवलप वर ल्या। प्रस्तुत उपयास छियने का मूल प्ररणा बिदु यही है ।
अपन जातिगत सस््कारा तथा सामाजिक मायताआ की बठोर जक डन वे! कारण मैं हरिजना का जीवन वी कदुताआ व स्वय ता नहीं भोग सता परातु फिर भा मुर्ये अपन दुस्साहस वे! कारण उनवे जीवन को बहुत निकट से देखन का अवसर मिला है! मैंने सवथा निरपेक्ष रहकर भारतीय जीवन के इन कटे हुए सदर्भों का चित्रण क्या है और कहां भी अपना मत थोपने अथवा अपनी विचारधारा को लइने
की चेप्टा नही की है ।
मगदीशचद्र
त
काली जब गाँव वे” निकट पहुचा ती पौ फट चुकी थी । वह एक सरड-मुड वृश्त वे! पास खडा होकर गाँव वी और देखने लगा जा सुबह के मलगजे अंधेरे म बहुत बडी गठडी की तरह नजर आ रहा था। गाँव से बाहर एवं हव॑जी म एक दिया टिमटिमा रहा थां। पास ही एक खेत मे हल चल रहा था ओर थोड़े थोड़े समय के वाद तुत तुत टक ढक तरे जनने वाठे को चोर ले' जाएँ चल पुत्रा गेर की तरह छाती के बल पर चल' वी आवाजें आती और साथ ही घुधरू जोर से छतछना उठत | दाली ने सिर से ट्रवा और क्धे भ लटक रहा विस्तर उतारकर रस दिया और वृत्त वे! तने वे! सहारे वठकर सोचने लगा कि शायद चौधरी फत्तू 4 खेत म हल' चल रहा है. शायद उसका बेटा प्यार हू चला रहा है. शायद सावनी वो लिए खेत तयार कर रहा है । काली का ध्यान फिर गाँव की ओर चला गया और वह आँख फाड फाड़ बर बृला की आऑट म छिप॑ हुए मकाता वी आर दखन ल्गा। गाव की एव गछी म॑ कोई कुत्ता भौक उठता तो उसके उत्तर म॑ दूसरी गल्या से कई कुत्ता के भोकक्ने को आवाज़ें आने लगतां और फिर थोड़ी देर के बाद गाँव मे ऐस खामोशी छा जाती जसे कोई आदमी स्वप्न म बुदबुदान के बाद करवट बदल कर सो जाए। वहाँ बढे-बर्ठे काली को भय महसूस होने लगा । उसके दिल म छ साल के पश्चात गाँव लौटते वी खुशी खत्म होने छगी और उसका जी चाहा कि वह उल्टे पाव कानपुर वापस चला जाए। उसे याद हो आया कि जब वह गाँव दे लिए चला था तो क्तिता प्रसन था और उसने चाहा था वि उडकर वहाँ पहुच जाए जोर अब वह गाँव के! बहुत निकट है सिफ पाँच-सात खेत दूर है तो वह लौट जाना चाहता है। फिर उसे अनायास ही चाची का स्थाल भाषा और उप्तकी आँखें भर बाइ | उसने सोचा, क्या पता वह जिटा भी हांगी या नहीं | हो सकता है उसके गाँव छादने के थाडे दिन बाद ही मर गईं हा । यह भी सम्भव ह कि बह जिदा हा । बया पत्ता विस हालत मे हा ।
घरती धन न अपना हट
जब मुग ने थाग दी तो वाली हृडबडाकर उठ बठा और सामान उठाकर जत्टी जल्दी गाँव थी ओर चल दिया । जब वह पहली ह॒वेलो के पास पहुचा तो एक कुत्ता कान फड़फडाक्र उठा और भौंकता हुआ उसके आगे भागे चलने रूगा । उसने कुत्ते की आवाज को पहचानने की कोशिश की छेक्नि दूसरे ही क्षण अपने इस प्रयास पर उसे हँसी आ गई । बह अपने दाएँ बाएं मकाना को पहचानने की कोशिश करता हुआ तेड-तेज कदम उठाता रहा। उसने देखा कि बडा रास्ता पहल से काफी नीचा हो गया है ) शायद पिछले कुछ वर्षों म॑ बहुत जोर दी बरसातें लगी हागी । गाव वी अभिन गध उस कदम-कंदम पर जपने से परिचित करा रही थी और वह नयुने फुछा पुलपरर उसे सूध रहा था | जब वह कसी मवान या हवेली के सामने पहुचता तो उसके मस्तिप्क मे कई तस्वीरें उभरती । लेविन वह उनसे आँखें चुराता हुआ भागे बढ जाता । चौधरिया के मुहल्ले के वाद स्कूल आ गया। चार कक्षाओं वे इस स्कूल मे काली ने भो कुछ समय तक मुशी के पाँव दवाएं थे उंगलियों के पटाखे निकाल थे और हडे खाए थ। वह रक्कर स्कूल वी ओर देखने छगा और मुशी शिवराम के वारे मे सोचन लगा जिसके लिए जाटो के हएडक साभ गन गाजरें मूल्याँ इत्याटि लात थे मौर कम्मिया के छडके उसके घर पहुचाते थ । स्कूल वी हालत पहल जी ही खराब लिखाई देती थी और उसके आँगन म बड़ के बूढ़े वृक्ष वी घनी परछाइया ने रात के अधेरे को और भी गहरा कर दिया था | स्कूल वी विल्डिग के पीछे एक तीन मझिला मकान घमडी आदमी की तरह अक्डा खडा थां। काली के मन मे चोधरी हरनामसिह की यादा का उस्ता खुल गया और वह उन याट को झटठकता हुआ आग बढ शया । स्कूल स कुछ दूर जाने पर उसे मदर का कलश नजर आया। माँ दर वे चारा आर गाँव व दूवानटारा व चौयारे थं। वह पण्डित सतराम क वारे म साचने एगा जो हरिजना को देखकर दूर से ही दुर-दुर वरना शुरू कर देता था । वह घोड़ा और आग वटा तो उसकी नजरें गिरजाघर के बच्च वी बाँहा की तरह फल हुए क्रास पर यह गद ओर गाँव के पादरी का मसव्रीत चेहरा आँखा बे सामने घूम गया | थाही दूर और आग जान पर उस जार वी ठोतरर गा और वह गिरते गिरत बचा । गावर को तू बटबू ने उसे खमालडी (हरिजना वी रस्सी) व निकट ही होते वा सवत _िया । रस स्थान पर बडा रास्ता काफी गहरा हो गया था कपाति साँव में बरसात गा सारा पानी इसी रास्ते से हांवर चा भ जाता या। गुछ क्षाणा व याद ही वह चमा”शे रु बाहर कुए पर पहुंच गया । शभुए मे गिल यह
पानी और कीचड वी छपडी वनी हुई थी। वह कुछ क्षणा के लिए रुक गया और सामने छोटे छोटे कच्चे मकाना की देखने छलगा। फिर वह दुएँ के गिद चवकर क्यूटकर उस जगह पहुच गया जहा से मुहल्ले के अन्दर जाने वाली गछी घुरू होती थी । वह गली के मुह पर रक गया और सामने भगन््दे पानी वी छपड़ी को पार बरने की तरकीब सोचने लगा । उसके जेहन ने उसे वह तरकीव बताई और अपने आप हो उसका पाव पानी मे डूबी इटा को टटोलन के लिए उठ गया और दूसरे ही क्षण वह उस छपडी को पार करके गली म घुस गया । गली म॑ कई बुत्ता न मिछकर उसका स्वागत किया । दूसरी ओर से भी कुत्ता ने उत्तर मे भौंकना शुरू कर दिया और इतना शोर मचाया कि काली को यह आशका हाने छगी कि इस गली म शायद कंवल वुत्ते ही रहते हैं । परन्तु जय वह एक टूटे हुए मकान के सामने रक गया तो कुत्ते आहिस्ता आहिस्ता इधर उघर खिसकने लगे । काली टूटे विवाड को देखता हुआ सोचने ल्ूगा वि पता नहां चाची अभी जीवित है या मर गई है । उसके दिछ भ होल सा उठा और उसने जल्दी से अपना हाथ साक्ल वी ओर बढा दिया | बाहर की सावरू खुली थी | उसने क्विड को धीर स दवाया तो वह मदर से वद महसूस हुआ । खुशी वे मारे उसका दिल उछलने गा और वह साकल खटखटा कर बहुत तंज्ञ धडक्त दिल से उत्तर वी प्रतीक्षा करने ल्गा । जब कोइ उत्तर न आया तो उसने लोबारा प्तावलरू खटखटाई । जय फिर भी कोई उत्तर न जाया
तो उसका दिल डूबने लगा । उसने क्वाड को जार से थपथपाया ओर भआहिंस्ता सेकहा
चाची ।
बुछ क्षणा के बाद अन्दर से खाँसने की आवाज़ जान लगी। काली फिर खिल उठा । बहू क्विड के बिल्कुड पास खडा होकर अदर से साँसने वी और है रब जी तेरा ही आसरा वी आवाज़ी को ध्यान से सुनने लगा । इतने मं पड़ोस का दरवाज़ा आहिस्ता से खुला और एक आदमी जगली क्दूतर की फुर्तो से अंधेरे मं खा गया। केवल उसके जूत वी ची ची की थावाज् सुनाई देती रही । बाली उस दरवाज़े की ओर देखने छगा । उसके जेहन म कुछ आलुजा जसी नम ओर स्वस्थ और कुछ सूखे बर जसी प्राणहीन सी शकक्लें उभरी | परतु अगले हो क्षण खाँसी की आवाज़ के साथ कौन है क प्रश्न ने उस चौंका दिया और वह दरवाज़ से पीछे हट गया । दोना पट खुके ता अंधेरी डयोटी से दुगाध्व भरी
हवा बाहर निकली और साथ ही दो बुझी-बुझी आँखें उसकी ओर देखने लगी । चाची । वाली ने भराई हुई आवाज़ म कहा और उसदे पाँव की ओर झुब'
चघरतो धन न अपना ११
गया। छाची वाली वी आवाज़ पहचानती हुई बोली 'कौन वाली है ?! उसने स्नहूं और आश्वय भरे स्वर मे वहा जस उस विश्वास न आया हो । उसने बाली थे सिर पर हाथ फेरत हुए उस ऊपर उठाया और उसका माया घूम कर बोली रख साइयाँ दी । पाली जब ट्रक ओर रिस्तर उठावर अन्तर आने लगा तो चाची ने उसे राक तिया भौर स्वय कोठडी म जाकर सरसा के तछ वी शीशी तलाश वरत लगी । शीशी हाय छलूग गई तो उसे याट आया कि उसम त्तर नही है। वह खाली शीशों लेकर ही वापस्त आ गई और दहटीज के दोना ओर एक एक बूद तर टपवात र वालो को इस तरह जादर ले आई जसे वह सारे ससार पर विजय पावर लौटां हो | चाची वी झुवी हुई वमर एकदम सीधी हो गई । उसकी प्रकाशहीन आँखो को अधेरे म भी दीखने छगा और वह सोलह साल की मुटियार की तरह पुर्ती स पोठडी मे घूमने लगी | उसका पाँव जमीन पर नही पड रहा था । उसने दियासलाई तलाश करत मिट्टी के तेल का दिया जलाया और काली को खाट पर वठाकर उसका चेहरा' अपने हाथां मे लकर दीवानावार चूमती हुई बोली मेरा लाल वापत आ गया ।' फिर कुछ सोचकर चाची की आखो मे पानी आ गया। काली गुम सुम बठा कोठडी मे चारो आर देख रहा या । कोठडी की दीवारे शहतीर और कडियाँ चाची की तरह बूढी हो छुकी थी और अपने ही थोझ तले दवी जा रही थीं। काली चाची की भोर ध्यान से देखता हुआा बोला चाची ! कसे कटे दिन । यह कहकर उसवी आँखों मे जॉँयू आ गए। चाची भी उत्तर म॑ सुबकियाँ लेने लगी । फिर वे दोनो फूट पडे । वाली चाची के घुटना पर सिर रखकर खूब रोया । इस मुदृत मे दोनो ने जो कप्ट सहन किए थे वे आसुआ की जवान से एक दूसरे को बता दिए । रोते रोत काली को जब हिंचवी आने लगी तो चाची उसे चुप कराती हुई बोली न रो पुत्तरा । य सव तकदीर का चक्कर था। तेरा चाचा ज़िदा होता तो तुम्ह पाताल से भी ज़ोज लाता । तुम्ह गम हवा तक न लगने देता । यह कहवर चाची रोने लगी तो काली उस्ते दिलासा देता हुआ बोला चाची अब मैं एक पल के ल्ए भी तरे से अछग नही रहूँगा | दिन रात तुग्हारी सवा हरूँगा / चाची हिचकियाँ लेदी हुई वाली काका तूने भी ता अतथ किया। रडी (विधवा) चाची वो यू छोड
२ धरती घन न अपना
कर चला गया जैसे तेरा उसके साथ कोई रिश्ता ही नही था । म॑ ता पहले ही मुसीवता वी मारी हुई थी । दिन रात तुझ में खोई रहती। रह रहकर दिल मे हौल उठता। जिसने जो उपाय बताया वह क्या । रवड से विछडी हुईं बछिया को वी देख लेती तो रो रोकर मैं अपना बुरा हाल कर लेती जौर सीचती कि मेरा काली भी परदेस म इसी तरह डावाडोर और खोया-खोया फिरता होगा दिन रात मैं नीली छत वाले से यही विनती करती कि मेरा लाल ठीक ठाव हो । मैं उसके हाथो म ही भरू ॥ फिर वह काली को ध्यान से देखती हुई बोली क्यका क्या मैं तुम्हे कभी याद नहीं आती थी ?' काली ने मुह फेर ल्यिा जौर रुंची हुई आवाद्ध म बोला चाची, तरी याद ही तो मु्े गाव वापस खीच छाई है यह कहकर काछी ने अपना सिर चाथयी की गोद मे रख दिया चाची उसके चौडे क्धा पर हृएय फेस्ती हुई बोली आज तेरा बाप जिदा हाता तो तुम्ह देखकर क्तिना खुश हांता ६ उससे ता तुम्हे जी भरकर देखा भी नहां था कि मौत ने आ घेरा । तेरी मा को प्लेग खा गई। चाचे ने चप्पे गिन गिनकर पाला पोसा लेक्नि उसे भी हैजे ने या लिया । तुम्हे तो शायद उसवी सूरत भी याद न हो | सारे खानदान की तू ही तो एक निशानी है । चाची फिर फूट फूटकर रोने छगी ॥ वाली उसकी गोद म सिर रखे हुए उन दिना की याट करने लगा जब छ साल पहले वह दो दिन का भूखा प्यासा फ्टे हा घर से चोरी भाग गया था। चाची भी यादा में खोई हुई अपन दु खा को याद करके बार-बार रो पडती । वे दोनो वहुत देर तक गुम सुम बठे रह | चाची के दिल भे जसे होल उठा और वह काली का माथा चूमती हुई बोली 'पुत्तरा परदेसी पछी भी उडते-उडत साल्हू-दो साल बाद फेरा डाल जाते हैं । लक्नि तू तो ऐसा गया कि तरी कोई खबर ही न मिली फिर वह अपने आसू पोउतो हुई बोलो काका, मुझे सिफ तरा ही आसरा है । तरे सहारे उडती फ्रिती हू।तू भा गया है तो यह घर भरा भरा मानूम होता है । तू बाहर था तो यह कोठरी मुझे उजाडइ दिखाई देती थी ।
“चाची अब मैं कभी एक पल के लिए भी तुम्ह छोड़कर नहो जाऊँगा। तुम्हे राज कराऊंगा। खाट से नाचे पाँव नही धरने दूगा ।/
दिन चढ़ने तव दोनो वा मन हल्का हो चुका था $ चाची ने काली के
धरती धन न अपना १३
लिए बिस्तर विछा टिया । तू घडी भर सो ले | पता नही क्तिन टिंन का सफ्र बरवे' आया है। मैं गली म॑ तुम्हारे आन व॑ वारे मे बता द । यह कहकर वह गली म आ गई परन्तु उल्दे परा पलट थाई और वाली की खाट क पायेते बछ्ता हुई बाली कावा मैं सोच रही हू वि इस तरह बताने वो बजाय ग्रली म॑ चुटकी चुटकी शववर बाँट दू तो सबको अपन आप ही पता चल जाएगा । और फ्रि तुम्हारी वापसी वी तो मुझे तुम्हारे 'याह स॑ भी ज़्यादा खुशी #। तेरी क्या मर्जी है ?' चाची जो जी म आए करो | तुम्हारी मर्जी ही मेरी भर्जी है । काली ने यह कहकर कवरबट बदल ली । चाची चारपाई पर बठी रही तो काली आशचय म॑ पड गया और फिर उसे अफ्स्मात ही जसे कुछ याद आया, वह जल्दी से उठा और अपने ट्रक का ताला खोलकर क्पटा की तह के नीचे से बहुत से नोट निकाले और चाची वी और बढाता हुआ बोल्य ला चाहे शवकर की बोरी ले आभओो । चाची न बहुत से नोट देखे तो आश्चय से उसकी आख फल गई और वह उहं कपडा वी तहा मे छिपाती हुई वनावटी गुस्स से बोली मुझे कोई दूकात खोलनी है ? चार पस॑ द॑ छज्जू शाह की दुकान से सेर- आध सर शवकर ले आऊ। काली ने दस रुपये का नोट चाची क॑ हाथ मे थमा दिया ता वह ऊची आवाज म बोली यह कया है ? तू मुझे टूटे हुए पसर दे । इससे छाटा नोट मर॑ पास नहीं है। काली ने दस का योट उसके हाथ मे देते हुए कहा । चाची न नोट को फलाकर देखा और घबराइ हुई जावाज भें वोली सदूक को जल्दी से ताला मारकर कही छिपा दे । यहाँ लोगा वी नज़र बहुत दुरी है । पिछले दिनां ब्यास पार स वता की भतीजी थाई थी। उसका शादी हुए दा महीने ही हुए थे। उसके गहनते-कपड देखकर प्रीतो न नद्वर लगा दी । उस बेचारी का सब कुछ उसी रात चोरी हां गया। काली चाची की बात पर कुछ क्षणा तक हसता रहा और उसके कहत क॑ अनुसार ट्रवा को काने मे छिपा टिया | चाची दस रुपय के नोट का कई तहा म छिपावर गली म आत जात लांग्रा की नज़रा से वचती शक्कर लेने के छिए छज्जू शाह की दृकात वी और चछी गई।
श्डं घरतों घन न अपना
न
चाची के जाने के बाद बाली कुछ समय तक खाट पर लेटा रहा | छ बंप के विछोह ने उसमे गाँव और इसके वासिया वे प्रति अजनेबीपन पदा कर द्विया था । यह सोचकर उसे डर लगने लगता वि थांडी ही देर म मुहल्ल वी सब स्त्रियाँ बच्चे और कुछ मद उसके घर जमा हां जाएँगे और तरह-तरह क॑ प्रश्न पूछेंगे । काली प्रसन्न होने की बजाय बहुत वेचन था जौर चाहता था कि यह घडी कसी तरह दल जाए तो अच्छा है । वह खाट पर छेटा करवटें बदल रहा था । रात भर जागते रहत के! बाव- जूद नीद और थक्ावद उससे कांसा दूर थी । जब ल्टे लट उसका मन ऊब गया और बेचैनी और भी बढने लगी तो वहूं उठकर अपने क्ोठे को छत पर आ गया | बोदी सीढी के आखिरी डडे पर खड़ा होकर वह सामने देखने लगा। चमादडी के कोठा से परे दूर तक खुले प्ैत फले हुए थ | बाइ जोर चो की चमकती रेत थी। चो के दोना ओर बाँध वना दिए गए थ। इह देखकर काली को हैरानी भी हुई और खुशी भो । चमादडी के पास ही चो के परले क्नारे पर बड़ के वृक्षा और शीसमा से घिरा हुआ तकिया (चौपाल) था । दाई आर मादर और महाजना के मकान और चौवारे थे) उतसे पर स्कूल ओर नम्वरटारों के मकान और हवलियाँ थी ! पश्चिम मे गष्पिया मादिया, मिट्टा और चुनौतियां (मुहल्ला के नाम) क॑ मकान और हवल्या थी । काली ने सीढी के पास ही छत पर खडे होकर चमादडी के कांठों पर नजर दौडाई | मटमैल रंग के कच्चे और छोटे छांटे कोठे चा क॑ दाएँ क्तारे तक फले हुए थे। मुहल्ले के अदर एक छाटा सा चौगान था जिसके बीचो- बीच एवं बेरी थी। चमादडी म एक ही रूम्दी और तग गली थी जा सारे मूहल्ले मे कही सीधी और कही बल खारर घूम जाती थी । उसम से केवछ एक छोटी-सी गली निकुल्ती थी जा बात फत्तू, त्ाय वसंत इत्यादि क' घरा के सामने से होकर चो म जा निवलती थी । मुहल्ल दे वाहर गोदर और कड़े के ढेर थ ओर एक-दो छोटे छोटे छप्पड थे तिनका पानी मई की धूप से खुश्क हो चुका था । वह चमादडी के कांठा का देखने छगा । पूरे मुहल्ले म एक भी एसा काठां नहीं था जिसम पक्की इट ऊरूंगी हां | पिछली वरप्तात क बाद इन पर अभी लेप नहीं क्या गया था इसलिए वे कमज़ोर और उनकी दीवारें खुरदरी नज़र भा रही यी । छगभग प्रत्यक घर से ओपलो का कड़वा घुआं अल्साया हुआ
धरती धन न अपना श्भ्
सा ऊपर उठ रहा था। मुहल्ल म सुयह वे समय भी निस्तथ्वता छाई हुई थी जिते कभी तिसी मंद की गाली विसी औरत पी चीखती हुई आवाज़ या किसी बच्चे वे” रोने की चीय त्तोड देती थी । काली को गली म 'चाची वधाइयाँ' की आवाज़ सुनाई देन एयगी तो वह नोचे उतर आया । यह सोचवर उसका दिल कॉपन लगा वि अभी भुहल्ले की स्त्रियाँ जौर बच्चे धावा वोल्वर उसके कोठे म॑ घुम्त आएँगे। उसबी समझ मे नहीं आ रहा था शि लोगो वे आभाने पर वह उनसे क्से और व्या बातें करे। गली म “चाची-बधाइयाँ को आवाज़े प्रतिशण निकट आ रही थी और उसवी बैचनी बढती जा रही थी । काली के पास सबसे पहले उसकी पदोसन, निक्कू वी पत्नी प्रीतो आई। वह गली मं स ही उसे पुकारने लगी वे काली, वे तू आ गया ।! जव वह आदर आ गई तो वाली उसके पाँव वी ओर झुक्ता हुआ बोला चाची मत्या टेक्ता हूँ 'जुग जुग जियो ।* प्रीतो ने उसके सिर पर हाथ फेरना चाहां तो उससे गदन झुका ली । बह सीधा खडा हो गया तो प्रीती ने उसे भरपूर नज़रा से देखा। काली ने भी उस पर घ्यान से नियाह डाली । प्रीती का शरीर ढल गया था लेकिन उसके रख रखाव मे कोई अंतर नही आया था। उसने मसूढो पर रगदार दातन क्या हुआ था और वे एस दिखाई दे रहे थे जसे रबड के बने हुए हों । माक' भे कोके और ठोडी पर इृत्रिम तिल का रंग फीका पड गया था । काली नज़रें इसरी ओर फ्रता हुआ बोला भाची, ठीक ठात हो ना चाचा ठीक है छरच्छो अमरू और नाथी हीव है ? वह यह पूछ ही रहां था कि एक साथ ही सात बच्चे अदर आ गए। उसने उनम से तीन बंच्चा--लच्छा, अमर और नाथभी को तो पहचान लिया लैकिन बाकी उसके लिए अजनवी थे | व आग बढकर अमरू को बाजुआ म॑ उठावा हुआ बोशा सुता अमल तू तो बसा-वा-वसा घिसा हुआ है । फिर उसने लच्छों गी ओर दखत हुए कहा नच्छा क्या हाल है तू तो बटत बडी हो गई है । लच्छा ने मुबर्रात और घरमात हुए मुह दूसरी आर फर लिया ।
१६ धरती धन न अपना
चाचा तो धाम पर गया होगा 7?! नही, काम पर वह वहाँ जाता है । वह तो चौधरी है । पचायत मं बैठता है। तबिए से उठा तो शाह की दूकान पर जा बठा वहाँ से उठा तो विसी और व थड्ढे पर धरना दे दिया ।' प्रीतो ने नफ्रत से कहा । 'बया उसने अपीम छोड दी है ?* 'कहाँ, अब तो पोस्त भी पीने लगा है। वह साल भर डेरे वाले महता के पास रहा, वहाँ से पोस्त पीना सीख आया ॥' भरीता ने उत्तर दिया। काली ने छाट छाटे बच्चा पर निगाह डालकर पभ्रीतो बी ओर देखा तो वह हँसती हुई बोली य॑ सारी फौज भेरी ही है। घर से बाहर निवलती हूँ तो मोय लशकर बनावर मेरे पीछे पीछे आ जाते हैं ।' इतनी देर में जीतू और उसकी माँ निहाछी आ गई ६ वालो निहाली वे पाँव की आर झुकता हुआ बोला ताई मत्या टकक््ता हूँ । फिर उसने जीतू का अपने वाजुआ म लेकर जोर से भीच लिया और घुछ क्षणां के पश्चात उसे छोडता हुआ बोला 'सुना जीतू, ठीक हो ना ?'! हा तू अपनी सुना । तू कहाँ रहा इतनी देर ? हम तो त्तेरी इतज़ार मे मौंसियाँ डाल डालकर हार गए ।' जोतू ने काली के तगडे सुडौर और गठे हुए शरीर को देखते हुए कहा । जीतू के सहत और प्रौढ शरीर को देखकर वाली की एहसास हुआ कि वाल पने के बाद जीतू पर यौवन और बुटापा एक साथ ही शुरू हो गए हैं। प्रीतो वाली की बोर प्रशसा भरी नजरा से देखती हुई जीतू से बोली जीतू तू भी शहर चला जा। काली की तरह मोटा ताजा होवर वापस आ जाता । खुराक हो तो गाँव म भी शरीर वन जाता है। रूखी राटी खाकर तो शरीर बनेगा नहीं १ ताई निहाली दे कह । अच्छा काली, मैं घास छे आऊ । दापहर को आऊंँगा ।॥ जीतू मे काली के कघे थपथपात हुए कहा और बाहर निकल गया ) काली के घर म॒ स्त्रियां और बच्चा वी भीड प्रतिशलण बढ रही थी । बह हर औरत के' पाद की ओर झुक्वर भत्या टकक्ता और बच्चा को वाँहो भ उठाबर प्यार करता । जब वतू की पत्नी प्रसिनी आई तो काली उसे पहचान
घरतो घन न अपना १७
ते सका । वह उसके पाँव की ओर भी झुका तो प्रीतो उसे डॉटती हुई बोली फोट, तू यह क्या कर रहा है ? यह प्रसिनी है--ब तू की घरवाली । तू इसका जेठ लगता है। उल्टा ये तरे मत्या टेकेगी। यह सुनकर काली लज्जित सा हो गया और प्रसिनी न दबी टबी हँसी के साथ छोटा-स्ता धूधठ निकाल ल्यिा । काली ओऔरता के मल़े कुचटे फ्टे पुराने कपडा और नाक सुट्सुडात नग धडग बच्चा को देखता हुआ सोचने लगा कि वह क्सि दुनिया मे आ गया है । कई औरता और बच्चा की पलकें युलावी थी और उन पर एवं भी बाल नहीं था और उनसे पानी बह रहा था । उनके शरीरा और कपडों से पसीने को एसी दुगघ आ रही थी जिसस काली अपना परिचय खो चुका था। बच्चे चकित होकर काली को देख रहे थे और जब वह किसी वो पुचकारता तो वह धरमा कर अपनी माँ की टागा से छिपट जाता । जा बेटा यह तरा ताया है ! काली ने ये शद इतनी बार सुत्रे कि उसे विश्वास सा होने लगा कि इस मुहल्ले मं शायद उसवी सिधा सबके “याह हो चुक॑ हैं। चाची प्रतापी शक्कर बाटकर वापत घर पहुची तो एकबार फिर चाची बधाइयाँ प्रतापिय बधाइया की कई आवाजें एक साथ गूज गइ। सब औरता ने अपने-अपने दुपटटे के पलल से मुटठी भर अनाज खोला ओर काली के प्तिर सवार कर उसकी बलाए ली | उसके चगंड और जवान शरीर को देखब'र कई औरतो क्यो अपनी कवारी युवा भतीजी भानजी बहने था भके की क्सी जवान लडकी की याद आने लगी और उनका जी चाहा कि उसका रिश्ता काठी स निश्चित हो जाए ! सब औरता ने चोरी छिपे खाट के नीचे पड वाली के' द्क को देख लिया था और वे उसम पडी वस्तुआ के बारे म॑ अपने-जपने अनुमान लगा रही थी | हर एक उसी हिसाव से वाली को यह जताने की कोशिश कर रही थी वि उसवी अनुपस्थिति म उत्न चाधी की ब्रहत देख रेख की है । ताई निहाली न काली का माथा चूमत हुए कहा कि जीतू भौर वाली आयु मं वरावर और भाई हैं ती प्रीतो भी सबको सम्वाधित करती हुई बोली कली तू तड़क ही पहुच गया था ना ? हाँ चाची । तुम्हारी आवाज़ सुनकर मैं सोच मे पड गई कि भाभी के साथ कौन वातें बार रहा है। जब मैंने तरे चाचे वी खाट वी ओोर देखा ता वह खाली थी ॥
श्८ घरतों धन ने अपना
मैंने समझ लिया कि भाभी वा हाल चाल और वाम-वाज पूछने गया होगा । रोज़ सवरे उठत ही बह पहले भाभी वे” पास जाता है । बुजुग स्वियाँ वाली के ट्रक के बार म खुसर फुसर बर रही थी और असू की पन्नी प्रसिनी, नदर्सिह वी बेटी पाशा और प्रीतो वी बटी रूच्छा बाकी ओरता से अलग एक कोने म खडी थी । उन्हान भापस से वोई वात वी आर खिलखिलावर हँस पडी ) पहले तो कसी ने उनकी ओर ध्यान न दिया लेकिन जब व हंसी के मारे लोट-पोट होने छगी तो प्रीता नाव सिकाडती हुई बोली 'नी तुम्ह क्या हो गया है क्या हिंडहिड वर रही हो ? जब तीना हँसी से दोहरी होने लगी तो सववा ध्यान उतवी ओर चला गया और एक साथ कई आवाज़ आइ वया हो गया है तुम्हें ? प्रसिन्नी दो बच्चा की माँ बन गई हैं, तीसरा पट मे लए घूम रही है लेविन इसवी छोवर-खेल खत्म नही हुई ।” प्रसिन्ती पर इस बात का कोई असर न हुआ और हँसत-हसत उत्तका चेहरा एसा लाल हा गया जस उसमे से छून फूट पडेगा। प्रीतो उसके क्धा को झक्झारती हुई बोली नी, अवेली ही हँस रही है, हम भी कुछ बता | जब प्रसिनी ने कुछ न बताया तो प्रीतो न अपनी बंटी का भिडवत हुए उसस पूछा लच्छो का चेहरा शम से लाए हा गया और वहूं अपन-आपकीा सिताडती और समेटती प्रसिन््नी वी आर सवंत वरती हुई बाली पर बहती है का बारी वा जरीी सं-जत्दी ब्याह चर ऐेना चाहिए | लेच्छा चुप हा गई परन्तु प्रीता समझ गई वि प्रसिनी ने आग क्या बहा हागा। उम्र क्राध ता बहुत आया रकिन वह हँसती ३ ऊँची आवाज़ मे बाला ठीक तो है। काली अब व्याह नही वरगा ता क्या थुड़ढ़ा हतर बरगा । इसके साथिया क तो तीन-तीन बच्चे हैं ।”
_ _ हर न जाता तो अब तक शायद उसके चार बच्चे दात ।' दूसरी भौरत नेंक्क्हा।
प्न्रे. स्कैक्तू औबौर वालो के तो लगन दीरल ताई-+ नहारटी उदास रबर नही ४ नष्टा डर गली ; ए ््ैँ | -॥ द्द् दास
इसकी शादी आप कम क्रती हुई घांडिया यरा दूँ । श्रोवा सयता इशारा
धरती धन न अपना १६.२
प्रसिनी ने अपन घर से छाल रग वा दुपट्टा एापर भाती मे मिर पर रख दिया | उहनि चाची यो घमीटवर दीच म बिठा टिया और ये सब इस तरह जोश से गाते छगी जे सचमुच बाली या ब्याह रचा हा । प्रीतो न परादी वा पानी का घड़ा साली बर टिया और टीशररा से थाप दने छगी । ताई निहाली सबको बोल उठाने का सबत बरती हुई गान लगी जिस तिहाह मेरा वाली नी जम्मया सोई दिहाडा भागाँ भरया । (जिस दिन मरे बाली ने जम लिया था वह दिन हमारे लिए बहुत घुभ था ।) सब स्त्रियाँ घड़े के गिंद बढ गद्द और झूम झूम वर गीत गाने एगी । साडे नमे साजन घर आय सलल्ोनी द नन भरे। सानू वी वो वस्तू कृपाय सलोनी दे नन भरे। सानू गरी ऊ दुआरा छयाये सलोती द॑ नेन भरे। सानू कुडमें दी जोरू ल्याय सलोनी दे नंन भर। वाली गीत सुनकर कभी हँसने छगता और कमी झेंपकर मुह छिप्रा लेता । उसका अजनवीपन दूर हो गया था और वह इस तरह प्रसान था जैस बच्चा अपनी माँ पी गोद से घठा लोरियाँ सुनवर प्रसन हो रहा हो ।
३
गली में कई छोग दगड दगड करते हुए गुद्धर गए तो वाली की आँख खुल गई। उसने एक क्षण के लिए इधर उधर देखा और करवट बदलकर फिर सो गया । लेकिन जब एक साथ कई आवाजें आइ और उस पर एक बहुत भयानव चीख छा गई तो वह हडवडाक्र उठ बठा । नजदीक दी मकान की छत पर खड़ी एक स्त्री ने ऊंचे स्वर में कहा
चौगशरे काला चौधरी गालियाँ दे रहा है । पता नही किसकी शामत आई है । सद लोग चौगान मे चल गए हैं ।
काली उठकर चारपाई पर बढ गया और ध्यान से आवाज़ों को सुनते
० धरतो धन ने अपना
लगा । कोई फरर फरर् गालियां दे रहा था । फिर किसी वे! ग्रिडगिडाने को आवाज आई 'चौधरो जी, मेरा कोई कसूर नहीं। आप मुझे / किसी के स्तर पर पटाख-पटाख जूत पड़ने की आवाड आई और साथ ही याचना भरी चीख गूजी 'हाय, मैं मर गया--मु्ये बचाओ ।॥* चमादडी म॑ ऐसी घटना कोई नई बात नही थी । ऐसा अवसर होता रहता था। जब किसी चोधरी की फसल चोरी कट जाती या बर्बाद हो जाती या चमार चौधरी के काम पर न जाता या फिर विसी चोधरी के' अदर ज़मीन का मलक्यित का एहसास जोर पक्ड छेता तो वह अपनी साख बनाने और चौधर भनवाने वे! लिए इस मुहल्ले मे चला जाता । जव चीख दोवारा गूज उठी त्तो काली पाँव मे जूता धसीदता हुआ गली भें आ गया । चाची उसे रोकती रही लेकिन वह चौगान वी और बढ गया । वह चोगान में पहुचा ता मुहल्ले के बहुत से मद कमान वनाकर खडे थे। बीच में चौधरों हरनाम सिह बाएँ हाथ की दो उँगलियां से तहयद का पल्लू थामे हुए खडा गालियाँ दे रहा था। कोठा वी दीवारा और दरवाजो के साथ मली कुचली स्त्ियाँ भयभीत बच्चा को छातिया से छटकाए या अपनी टागा मं दबाए हुए चौधरी और अपने मुहल्ले के' मर्दों को देख रही थी | बूढे और जवान सब ऐसे सिर झुकाए हुए थे जसे राजा के दरवार मे खडे हा । उनके मछे ताँवे वे रग के शरीर मद हवा म॑ हिल रहे पत्तो की तरह काप रहे थ॑। चौधरी हरनास सिंह सबका गाल्या द॑ रहा था लेक्नि उनके मुह पर ताले पडे थे । उनमे से कुछ छोग कभी-क्भार गाली सुनक्र हुस पडते जैसे उन पर फूल फेंका गया हो। सतु वाकी लोगा से ज़रा आगे सिर झुकाए खडा था । चौधरी ने उसे गाली देकर पुकारा तो वह ढिठाई से हँसने लगा । यह देखकर चौधरी कय क्रोध ओर भी बढ गया और वह कडकती हुई आवाज़ मे बोछा इधर आ सत्् के पुत्तर ॥! सलू अपनी जगह पर खडा ही बोला चौधरी जी मेरा कोई क्सूर नहीं मतो । वह अभी अपनी वात पूरी भी न कर पाया था जि चौधरी आगे बढा और
उसे घसीटकर आगे के आया । चौधरी न उसकी गदन मरोडकर उसका भोर वना दिया और जूते मारने लगा | सतू बिल्ख उठा
घरती धन न अपना श्१्
हिना
चौधरो जी मेरा वोई वसूर नही ॥ जब उसके सिर पर दो चार ओर जूते पड़े तो वह दहाडने लगा । हाय मे मर गया | मुझे बचाओ (! 'सच बता, जानवरा वो मरे खेत बी ओर क्या मोडा था| चोधरी जी, जिसकी जो घाहे सौगध दे दो मने यह वाम नही क्या ।/ सतू ने गिडगिडात हुए कहा । चौधरी जब अपना हाथ उपर उठाता तो सतू अपने दोता हाथ घ्िर पर रखकर जोर-जोर स चीखने लगता | घोघरी को उस पर शायद दया आ गई या वह थक गया, उसने जूता नीचे फेंक दिया और सतू को पाँव से ठोकर मारता हुआ तिरस्वारपूण स्वर मे बोछा कुत्ते वी औलाद, हडबींग तो ऐसे मचा रहा हे जस सूली पर चढ़ा दिया हो । चौधरी चमारो वी ओर देखता हुआ दुख भरे स्वर मे बोला (दिन रात पानी देकर मरई की अग्रेतरी फसछ उगाई थी । खेत लहलहाने रूगा तो क्सो भरदुद ने उसम जातवर हाँक दिए । सब लोग साँस रोके चोधरी की नज्ञरा से बचने की कोशिश कर रहे थे । बचचे डर थे' मारे अपनी माआ के पीछे जा छिपे थे । काली मजमा से हटकर बेरी के नीचे खंडा वाले और मले शरीरा को देख रहा था जो इत्मीनान से गाल्यिा और मार खा रहे थे । चौधरी हरनाम सिंह ने वहाँ खड़े हुर आदमी को सम्बोधित करते हुए कहा सच सच बता दो नही तो सारे मुहल्ले को इसी चौगान मे छिटाकर जूते ल््गाऊँगा । मगर जो मजमा से बाहर चौधरी के पास खड़ा था जीतू को देखकर बोला 'जीतू तू कल दीया-बत्ती के सम वहाँ था ?! 'जीतू भे मगू की ओर घूरकर दखा और तुनक्पर बोला तू कौन है पूछने वाला ? यह वहकर जीतू संहम गया और भाहिस्ता आहिस्ता पीछे हटने लूगा ताबि' चौधरी वी नज़रा से भाझल हो जाए । मगू चौपरी को सम्बोधित करता हुआ बोला चौधरी जी कल हिन ढले मैंन जीतू को आपके कुए वी ओर जाते देखा था| उस सम उसके हाथ मे लाठी भी थी । यह सुनकर चोधरी मजम म खडे हर आदमी पर नजर दोडाता हुआ बोला
रर घरती घन न अपना
'कहाँ है जीतू ?' और फिर उसे देखकर ब्रुद्ध स्वर म॑ वोला “इधर आजीतू ने जीतू मगू को धणा और त्रोध से देखता हुआ चौधरी की ओर बटा और उमके सामने जा छड़ा हुना । क्या तूने जानवरों को खेत को तरफ मोडा था ? उसने रांब से पूछा | “'दीपा-वत्ती वे! सभय में छज्जू शाह वे लिए कोयला हेने गढी के भटठे पर गया हुआ था। आप शाह से पूछ छें ।' जीतू ने हकलाते हुए कहा । वोयर के पृत्तर | जो म पूछ रहा हूँ उसका जवाव दे | चौंधरी ने उसे मोटो यो गाछो दंत हुए का । जोतू मे बोई उत्तर न दिया और भजमे में खड़े एक-एक आटसी की ओर दखन॑ लया ताकि उनम से कोई एक तो हामी भरे कि वह सचमुच गढ़ी के भटदे पर गया हुआ था $ सजमा से उसकी सजरें बेरी के नीचे खड़े काली पर जा टिको । वह उस देखकर भुसक्टने लगा और यह भूछ गया कि वह चौधरी के' सामने जवाद तल्ूवी के! लिए खडा है ! बह मुसरराता हुआ काली वी ओर बतने लगा। लेदिन चौधरी को गालिया वी वौछाड ने उस चौंका द्विया । कृत्ता चमार यू खड़ा है जसे यहाँ गरदावरी करो आया हीरे 7 चौधरी ने आगे वढ़क'र जीतू वो भदन से पकड़ लिया । उसने गदन अकड़ा दी ती चौधरी गुस्से से फुकारन लगा कुत्ते के पुत्तर | मेरी फसल मे जानवर क्या हाने थे ?' बह जो लिया मन नही हाने थे । जीतू न उद्दण्ड स्व॒र म कहते हुए गदन छुडानि वी कोशिश को ) यह दंखकर प्गू बोला घौधरी जी आजवल यह पहुलवानी भी वरता है ४ पहल्वानी का शोर तो एकदम निकार दूगा । मशके बाधकर उलछटा ह्टवाकर चमडी उधेड दूगा । चौधरी ने वहुत गुस्से से कहा और हाथ मे मजबूती से जूता पकडकर बोला 'हूराम को औरलाद | जाववरा की मेरे खेत मे बया हाँका था ?* चौधरी न अपना प्रश्न दो तीन बार दोहराम । जीतू न कोई उत्तर न दिया तो संगू दोलर तू कफ गूगा हो गया है जो जवाब नहीं देता | चौधरी जी इतनी देर से हछ रहे हैं । मगू के बाद निक्तू ने भी यही वात कही तो कई और लोग भी बोल उठे ।
धघरतों घन मन अपना २३
छेतित णीतू फिर भी घुप रहा और इरा तरह ययानी से र्घर उधर देखता रह्दा जस ऐोग उसकी बजाय तिगी और से पृछ रह हू घरौधरी वा जापू बी सामोशी बहुत अपमायजार छगी । उसने आग यद्वर उरी गहन झुरानी चाही एऐब्रित जब जीतू गले आडान एगा तो भौधरी भदग उठा। उसता गाए्यां देत हुएं अपने तहवाद को अच्छी तरह मसरर बांधा और कत्या हरर जीतू पी गर्दन झुका छी और तावड-तोड़ जूत मारता हुआ बोछा 'तरी मौत तुप्े बुछा रही है जो तू मुझ अपता जार टि्यान लगा है । जब चौधरी मारता-मारता थप जाता वा जूता मीच फक्शर हापता हुआ पुछता 'बता, तूने जानयरा को मेरे रेत ग वया हवित था ? ! पिर वह थूझता हुआ बहता मवई का एक ड/ठ” तब नहीं बचा । दो घुमाआ वा पूरा सेत उजाड़ दिया । जीतू फिर भी बुछ नही बोला, मेयर शोध भरी नज़द्य स चौधरी की आर दखता रहा | चोधरी ने उसके सिर पर जूता सारन प लिए फिर हाथ उठाया तो जीतू ने उसका हाथ पवशने की कोशिश की । यह दण्कर चौघरी आग बगूला हो गया । उतने णीतू वो धरा देवर नीच विछा टिया! और उधने' सार शरीर पर थुड मारता हुआ बोला त्तेरी यह मजाल, सामने हाथ उठाता है ? तरी बाटी-बोटी कर दूगा । चौधरी ठुड मार मारवार थक गया और हाँपता हुआ एक वत्म पीछे हट गया । जीतू ने जमीन पर से मुह उठाया तो वह खत से लूथपथ था। उसकी नाक और मुह दोनो से खून बह रहा था। खून देखकर चौधरी ठिठश गया लक्नि अपनी घवराहट वीं छिपाता हुआ रोव स॑ वोह भव मैं तुम्हे छोड देता है । फिर ऐस्ती हररत की तो सीधा जेल भिजवा द्गा जीतु के मुह भौर नाक से खून की बूद टप-टप गिर रही थी। सब देख रहे थे लेवित किसी मे इतनी हिम्मत नही थी कि उस्त उठाकर घर छे जाए । मजमा म॑ क्िंसी ने धीमे स्वर मे कहा चौधरी से कया भुकाबला ? उनके सामने अकड फू कसी ? पाँव पड जाता तो इतनी मार मे बच जाता ।* सव लोग भयभीत से उसकी भोर देख रहे थे | जीतू घ्तिर को दीन हाथा म॑ पकडक्र बठ गया था |
र्ष घरती धन न अपना
एक दो औरतञें जोतू के घर वी ओर भाग गईं और उसकी मा निहाली की बुला लाईं। वह जीतू के नाक और मुह से खून बहता देखकर जोर जार से रोने लगी और अपने सिर पर दोहत्यड मारकर बोली
'मोया, तू पदा होते ही क्या न मर गया | अभी तेरे प्राण निकल जाते तो अच्छा होता ।” यह कहकर बह सिर पीटने लगी और जीतू को चौधरी के पाँव की ओोर धकेल्ती हुई बोली
चौधरी एक बार ही इसका खात्मा बर दो । रीज रोज का क्लेश तो मिट जाएगा ! कसी को फ्सरू कट जाए तो चोर जीतू । कसी का काई नुकसान हो जाए तो ज़िम्मेदार जीतू ।'
ताई निहाली को चौधरी पर बहुत क्रोध आ रहा था लेदिन वह उसे प्रकंट करने म असमय थी । बेबसी के एहसास ने उसके धय वे रहे सह वध भी तोड़ दिए और वह अपने मृत मा-बाप और पति को याद करती हुई विलाप करने ल्ग्री।
ताई निहाली को बुरी तरह राते-पीटत और वावेला करत देखकर चीपरी देजारी से बोर माई अगर इस हराम की औलाद से इतना ही लाड है ता इसे अवल भी दिया कर । इस हराम के तुखम न मेरी दो घुमाआ मकई मिट्टी मे मिण दी । चौधरी के ये शाद सुनकर मयू भी ताई निहाली को डाटता हुआ बोला 'इस बुडढ़ी ने तो इसे सिर पर चढा रखा है । मा को डय छेता है तो समझता है कि सारा जहान इससे डरता है । माई ज्यादा टर दर्न कर । इसे घरलजा। प्रीतो मूहल्ले की औरता म सबसे आग खडी थी । वह मटक्ती हुई बोली रडी का पूत सौदागर का घोड़ा, जो कर के सो ही थोडा । जीतू तो ऋग का नाल है कही लगाता है तो कही वुझाता है ।! जब चोधरी न जूता पाँव मे पहन ल्या और तहवद को हीटा वर टिया तो आस-पास खड़े लोग समझ गए कि अब वह किसी ओर की मार पिटाई नहीं क्रंगा | कुछ छोगा ने आगे वत्व्र जीतू को सहारा दर खा विया। ताई निहाली राती और जीतू को गालियाँ दती हुईं उसे घर वी और ल जावे एगी। छाए ते पवल थे रफ्ता छइ३ (दिया और कई औरतें और बच्चे उसवे' झाम-पीदे चलने गे । औरता क झुरमुद म खडो मग्मू की वहन वानो न तीखी थावाज मं
चोधरा को गाली दी ता उसकी माँ जस्सा उसका मुह बद करता हुई चीखबर वाला
घरती धन म अपना बे
“रॉड क्या झ्याटा जबान ल्टवाती है | मगू ते सुत लिया तो जान से मार दगा ।
लबिन भानो फिर भी चुप न हुई और दवी ज़यान भे चौधरी वो गालियाँ देती रही | फिर वह भयमीत और मुरक्षाएं हुए चेहरा को देखन छगी जा चौधरी वी हर बात पर सिर हिला रह थ । भानों नधणा से उनकी जार दखा और सोचने लगी कि इनम से ज्िसो मे भी इतनी हिम्मत नहीं है कि चौधरी वो वंवल इतना हा व दे हि बह नाजायज्ञ मार पीट कर रहा है आग
क्र हाथ पकद लना ता चहूत दूर वी बात है ।
ज्ञानो की नजरें मजमा मे यड प्रत्यत्र व्यक्ति स होती हुई बाली तय पहुच गई । उस समय दाली वो उसवी आर पीठ थी । उत्तव पहनावे से उसे सहह हुआ वि वह बाहर वा आदमी हैँ वयात्रि अगर वह इस मुहल्ल वा रहने वाला हाता तो बरी व नीचे अदला खडा होन वी बजाय मजमा में खड़ा होगा । यह सोचकर चातो को बहुत शम महसूस हुई कि यदि वहू सचमुच बाहर वा आदमी हुआ तो क्या सोचगरा वि घाडेवाहा व॑ चमार बहुत वंगरत हैं, मुह खोले बना ही मार झा लेत॑ है ।
मजमा क॑ पांस खटा मंगू बढ़ चढवर बातें वरन लगा तो ज्ञानों उसे भी गालियाँ देन लगी । उसक्री माँ जस्सो उसे घर वी ओर धकेलती हुईं भुद्ध स्वर मबोली
राड, घर चल, गम चिमदे से तेरी जबान खीचती हूँ।
मुदियार बेटी का रॉड की गाली नही देनी चाहिए। बेबे हुक्मा ने जस्सो को समझाया ।
बैबे क्या वछ, इसकी तो-तो अ दर नदी रहती । चौंधरी को गरालियाँ दे रही हे । उसने सुन लिया तो हमारी शामत आ जाएगी ।
पुत्तरा, तू चुप रहा बर। मुटियार रडकिया वी तो आवाज़ पटों निवलनी चाहिए । बंबे ने भानो को समझाया ।
बंबे, कया केसे । नाजायज वात देखकर मुझे गुस्सा आता है । चुप नही रहा जाता | तानो ने उत्तर दिया | जत्मो तानो को भल्म प्रुण बहती हुई उसकी आर ल्ल्पकी तो वह अपने घर वी ओर दौड गई १
जीतू को उसकी भाँ घर ले गई तो चौधरी अपनी फ्सछ की वरवादी वी बात करते छगा । दयादातर लोग चौधरी के इद गिद खड़े थे और उसकी हर बात पर सिर धुन रहे थे। चौधरी ने जब छजू शाह को अपनी ओर बाते
हुए देखा तो वह आंर भी ऊचे स्वर मे बोलते लगा । छण्जू शाह उसके तिक्ट
२६ धरती धन थे अपना
आबर वाल चौधरी जी, मैं चमादडी वे बृएँ के पास जा रहा था। वहा नदसिंह न बताया वि आपकी दी घुमाआ अग॒तरी मक्षइ जानवरा मे उज़ाड दी हू । आपवी आवाज सुनकर इधर चला आया । छज्जू शाह वी वात सुनकर चौधरी जस फूट पडा । शाह दो घुमाआ मकई पर सुटागरा पर गया । पूरा खेत उजड़ गया। 'टुतनी अच्छी फसल थी एक डठल नहीं बचा। आंहां यह तो बहुत बड़ा नुक्सान हू, अनय है । मैं कभी कुएँ को मोर जाता तो फ्सल देखकर मन प्रस्तन हो जाता । छज्जू शाट ने खेद प्रकट करत हुए कहा ॥ ओर फिर आस पास खड़े लोगा वी समयाता हूआ वोल्य “मूर्सो, क्या ऐसी हरकत करत हां। चीधरिया कौ फसल उजाडोगे तो आप कहा स खाआगे | फिर वह बाव फत्तू का सम्बोधित बरता हुआ वाला वाया फ्तू तू ही इन छाशरा का समसाया कर | जिस थाली म खाना उसी म छेट करना शराफ्त नही है ।' छज्जू शाह चाधरी हरनाम सिंह वा हाथ पकडता हुआ बोला चौधरी जी य॑ लोग आप के कमान हैं। मल्ती कर बठे हैं, अब इहे माफी ददो। वह चौधरी को हवेली की आर ले जाने लगा तो उसकी नजर वरी के नीचे खड़े काली पर पड गइ और साथ ही दस रुपय का नया नोट उसवी आखा के सामन घूम गया छज्ज शाह चौधरी का हाथ छांडकर काली को आर जाता हुआ प्यार स बोला बाबू काली दास, सुनाआ कब लौटे ? मुच्चे तो सवरे तुम्हारी चाची न चताया' कि तुम वापस आ गए हां । काली छजू शाह का वदगी करता हुआ बोला तड़के की गाडी से आया हूँ । फिर वह रुक्कर कहने लगा रहना बहाँ था, शाह जी । व ही इधर उघर भटकता रहा ॥ आप सुनाओं घर मे सव सुख-साँद है । हा सब्र ठीक्-टठाक है ।' छुट्टी आए हो या यही रहांग ?! कुछ कह नहीं सकता । गाँव का जा हाल आज दखा है उससे तो जी चाहता है कि रात्र का गाडी स ही वापस चला जाऊहँ । काली न चौधरी की
धरती घन न अपना २७
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ओर देखते हुए कहा । यह सुनकर छज्जू शाह मुसकरा दिया और उसके तगड़े रूम्व शरीर को देख कर बोला दूकान पर आना । देस विदेस की बातें सुनाना । तुम तो दुनियां घूमकर आए हो । हम ता कोल्हू के बल की तरह इसी गाँव मे घूमते रहते है । बहुत जोर मारा तो सा५ शशमाही के वाद जाल धर या होशियारपुर का चक्कर लगा आए । मै ता आपके दशनो के लिए आन घाला ही' था ।' काली यह कहता हुआ छज्जू शाह के साथ चल पडा। उसने चौधरी के पात्त पहुचकर उसे बदयी की । चौधरी ने बदगी का जवाब देते हुए बहुत खुशक लहजे मे कहां कब आए हो ?* तडके की गाडी से आया हूँ। हू । चौधरी काली पर एक नज़र और डालकर वबोला। जाने से पहले चौधरी ने वहा खडे लोगो को धमत्नात हुए कहा अगर फिर किप्ती न फसल का इस तरह नुकसान क्या तो सारी चरमादडी को ज़मीन पर उलठा बिछाक्र पिटवाऊगा काली को यां महसूस हुआ जसे यह धमतरी उसे दी है। उसने चौधरी को ओर घूरकर देखा । चौधरी को उसका दस तरह देखता बहत बुरा लगा और बह उसी लहजे म॑ बोला चमार पिर पर चढत जा रहे हैं । इतका दिमाग खराब हो गया है । इहे सीधा वरना ही पडेगा | चौधरी जी सारे जमाने वी हवा बहल गद है । छज्जू शाह ने कहा और व दोना बुएँ वी जार निवल गए। उनके जात ही लोगा वी गूगी ज़वानें फिर बोलने लूगी | काई जीतू को दोप दे रहा था तो कोई चौधरी की ज्यादती का दत्मी जवान म रोना रो रहा था | वाली छाती पर वाजुआ की कडियाँ वनाए हुए जब मगू के' घर के सामने पहुंचा ता अठर से जस्सा के गालियाँ देने वी जावाज़ आ रही थी और उत्तर म एव और भावाज़ गूज रही थी जि वह चौघरा वी दाढी म जलती लक्डी लगा द्गी ।
श्८ धरती धन न अपना
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थोड़ी ही देर के बाद मुहल्ला फिर मामूछ पर आ गया जसे वहाँ कुछ हुआ ही नही था | मद अपने काम-बाज के लिए बाहर जा रह थे । बच्चे गली म॑ ठीए रिया स॑ खेलते हुए घम्मा चौसडी मचा रहे थे लेक्नि औरता म॑ अभी गहमा गहमी थी । दे गली म सुबह वी घटना पर टिप्पणी करती हुई बभी आपस भ सूगड पड़ती और वभी खुसर फुसर वरने लग॒ती। वाली की समझ मे नही आ रहा था दि चौधरी हरनाम सिंह ने जीतू को क्या मारा । उसने चौधरिया से स्वय भी लडबपन मे बई वार मार खाई थी और वह हर बार उसमे माभुले चात समजझवर झूल जाता था | उसे कभी शम महसूस नहीं हुई थी । लेकिन जीतु वो भार पडने पर उसे बहुत्त दुख हुआ बहुत ज्रोध जा रहा था। वह घर जाकर दीवार के सहारे जमीन पर ही बंठ गया और खाया खोया सा छत वी ओर देखने रूमा । हाथ एक-टूसरे से उत्झने लगे और दाइ टाॉँय अपन आप ही टिहने छंगी | चाची ने उसे दस तरह बठे देखा तो प्यार से झिडवती हुई बोली 'पुत्तरा ऐसे क्या बठा है | खाट ले ले ।' काली न॑ कोई उत्तर न दिया तो चाची उसे घ्यान से देखकर समझाती हुई बोली इस तरह टाँग नही हिलात॑, नहस हांती है ।' काली को टाँग हिल्नी बद हो गई लछेक्नि उस ने चाची की उत्तर न दिया । कुछ दर बाद चाची फिर बोलो जीतू वो मा निहाली बहुत दुखी है | मुझे उस पर यहुत तरस बता है। छोटी उमर म ही उसकी माँ मर गई थी | सर्म्बा धयो वी झिडक्या खाकर हृशियार हुई | ब्याह का चूडा अभी मैला भी न होने पाया था कि रंडापा दखग पडा | आज तक जीतू को देख देखकर जीती रही है । उसे उमीद थी वि बटे का सुख देखेगी पर ऐसा ऊगता है कि वह भी नसांव म॑ नही है। चाची ने अपनी वात जारी रखत हुए कहां निहाली जितनी भोछी है जीतू उतना ही शतान है । घर आता है त्ता माँ से लडता है । चाहर जाता है तो लगा से सगडा मोल छेता है । सात कोस का वर खाकर झगडा करने जाता है। आज उसे चौधरी न मारा । नाक की हड्डी टूट गईं है। खून के परनाले वह गए हैं। निहाली वेचारी कौ रो रोकर आयें सूज गई है। उसे तो जिन्दगी के आखिरी पहर मे भी दुख-ही दुख मिला है।'
घरती घन न अपना श्र
चाची परमात्मा को याट करती हुई काली वी आर दखने लगी। वह सोच में डूबा धीरे धीरे सिर हिलाता हुआ बोला
'घाची, चौधरी ने जीतू को नाजायज मारा है । उसका कोई क्सूर नहीं था। अगर जीतू की जगह मैं होता तो चोधरी की वाँह मरोड देता
काली की वात सुनकर चाची उसकी ओर भय ओर आश्यय भरी हदृष्ठि से देखन लगी और जब वह दरवाजे वी ओर बन्य तो उसे रोकती हुई बोली
काका तू कहाँ चशा ? अपने आदर वठ । चौधरी जौर जीतू का थगडा है । हम उस मे क्या लेना है ।
परतु काली दरवाजे से बाहर निकल गया तो वह पीछे जाकर उस दजने लगी | जब वह जीतू के घर की ओर जाने वाली गली म॑ मुंड गया ता वहे घबरा गई और सोचने लगी कि उसके' पीछे जाए लेकिन इस ख्याल से रुक गई कि घर सूना रह गया तो पभ्रीतो के' बच्चे कोई-न कोई चीज़ उठाकर के जाएगे।
वालो तेज़ कदम उठाता हुआ चौगान म॑ चला गया | वहा अब कोई नहीं था | केवल बछड्े जौर बछिया बधी थी जो चौधरियां की दया के रूप मे चमारां तक प&चती हैं।थे अपन-नापको मच्छर मप्प्ती से बचाने के लिए बार-बार पाव पटक रही थी और पूछो को प्ले वी तरह इधर उधर हिल्म रहो था ।
जब बह जीतू के घर पहुचा तो दो औरत दरवाज स बाहर निकल रही थी । बाव फत्तू वी पत्नी बव हुरुमा जो लाठी क सहार राम्ता टटोटझूटाल्बर आगे बढ रही थी और दूसरी निबक् वी घर वाली प्रीतो जो दो दजन वा रूगभग परच्चे जनने के बा” भी रगदार दातुत और तंकहू ने सहारे यौवन की सप्तीमाआ म ही रहना चाहती थी ॥ बे हुक्मा ने तरह बच्चा का जम टिया था। टेक्नि उन में सं बारह को अपन हाथ से धरती की गोल मे लिटा ट्या था। वह परमात्मा के डर वे वारण कभी शिकायत तक नहां करती थी। उस वा हिल इतना नम हां गया था जि वर बांटे वी चुभमत को तल्यार की वाट समझवर अपना बुरा हाल कर टेती थी । जीतू दे नाफ़् स खून बहता दफकर बय हृवमा रो पड़ी और सुवकियाँ ऐेती हुई कवछ इतता कह सकी कि परमा मा ते डरनता चाहिए जा सयका जहबार ताइता है।
गली मे आती हुई वह प्रीतो वा यही समझा रही थी कि माया वा अहवार नहों करना चाहिए । गरीरउ का आहता ध्छग स भी बुरो हाता है। टग्ति प्रीतां सुनतकर बारी
ञ्० घरती धन न अपना
बडा रोग है । ऊपर से बीमार रहता है। पी साँसी है तो मभी ताप । कोई न-वोई रोग घेरे ही रहता है। बावी रहां दछहीपा अपनी मौज बर रहा है। महीने दो महीने घाट चफ्र झगा जाता है । शहर म जूत बनाने वा वाम करता है। अपना गुजार दर रहा है रानी खुशी रह। यह पहार बय हुआमा ने ठण्डी आह भरी जसे बहुत सी बाता वो जवान पर आओ से रोग त्या हो । फिर वह सेल भरे स्वर मे बोली 'निहाली था दुय मुझ भ देखा नहां गया । जीतू तो मार यातर घाट पर पड गया वह वेचारी व्यावुलू हो रही है। अच्छा जो बर्मों मे लिसा है मिल वर रहेगा। बने वी बात सुनरर प्रीतो तुनववर बोली जोतू वो चोघरी न वौन-सा गडाप्ता मारा है। रण्डी माँ के साथ सेटता है । घाट पर य॑ पडा है ज से सिर पर बुह्हाडा एगा हो ।/ काली न प्रीतो वी ओर ध्यान से देपा और बुछ कहे बिना आगे बट गया । जब वह जीतू वे' धर पहुचा तो ताई निहाली जीतू व' नाव और मुह से खून साफ वरने वी कोशिश वर रही थी । जीतू चीपता चिल्लाता हुआ उसके हाथ परे हटा टेता। काली को देखकर ताई निहाली जीतू बी ओर सकेत करती हुई बोली वाली, देख चौधरी ने इसका क्या हाल वर दिया है। नाक की हाथ लगाती हूँ तो तड़प उठता है । भला इसने चौधरी वा क्या विगाडा या जो इसे पुलसियों दी मार मारी है पूरा साल उसकी बेगार वरता रहा और इसे सारी भेहनत का यह इनाम मिला है। ताई निहाली मला सता कपडा लेकर जीतू के मुह ओर नाक से खून साफ करने लगी | वह उसकी ओर हाथ बढाती तो जीतू या तो मुह छिपा लेता या फिर उसका हाथ झटक देता । काली ताई निहाली के हाथ से कपडा लेता हुआ बोला 'ताई ला मैं खून साफ करता हूँ तू पानी गम करके ला। ताई निहाली के उठने से पहले ही ज्ञानो, जो दरवाज़े वी ओट म॑ खडो थी झठ सामने आकर बोली ताई तू बठ मैं पाती गम वर देती हूँ। वाली ते चौकक्कर चानों की ओर देखा और साथ ही उसवी आँजा के सामन छ साल पहले की वद्यक विडर, झगडानु और खुले वाले गाली शान घूम गई जा सारा टिन छांटी उम्र की बछेरी की तरह गलछिया मे घूमती फिरती थी । कही गमी हो या शादी झगडा हो था फसाद, यह छडकी सारा
३३२ घरती घन न अपना
लिन उसी जगह मेंडराती रहती थी । काली ने ज्ञानो की ओर ध्यान से देखा भौर उसके यौवन और सुडील शरीर वी तकता हुआ बोला “नानो, तू तो बहुत बडी हो गई है ?' 'तू भी तो बडा हा गया है। नानो न बेबावी से उत्तर दिया और फिर ल्जातो हुई वाहर निवल गई । नाना गम पानी लाकर जीत् को खाट की पार्येती खडी हो गई। वाली गोला कपड़ा जीतू वे ह'ठा और नाक के नीचे फेरकर उसे निचांडता तो सुख पानी देखकर ताई निह्ाली का दिल बठसा जाता। वह राती हुई कावाज से बोली जातू के आदर से लहू के घडे निकल रहे हैं । अगर दो चार वार ऐसी मार पडी तो यह इस दुनिया जहान से जाता रहंगा । कालो हेंसता हुआ कहने लगा ताई ये खून नहा पानी है | तू व्या इतना घबरा रही है ?! जीतू के चेहरे से खूत साफ हा गया तो काली उसक॑ नाक पर गम पानी की टकीर करता हुआ जीतू वे ऊपर झुक्कर बोला जीतू, अब तबियत कसी हू ? दद कुछ कम हुआ ?! उसने कोई उत्तर न दिया | केवल वेयस नज़रा से काली वी और देखता रहा । उसकी आखो म॑ गहरी मठ्याली धुध सी छाई हुई थी । वह बुछ क्षणा वे' लिए काली की आर देखता रहा | फिर उसका हाथ अपन दोनां हाथा म दवा कर बोला काली, तू वो इस भाव से चला गया था | दोवारा इस नक् मं क्या आ गया है ?* और कहाँ जाता ? आदपी सब जगह से निराश होकर घर को ही लौत्ता है। वाली ने जीतू को समझात॑ हुए नर्मी से कहा | उसने आर्खे मूद ली और मुह दूसरी ओर फेर लिया। कुछ क्षणा के वाद उतने पल्टक्र काली की आर दखा जसे उस उसकी बात पर विश्वास न आया हा ) उसकी आखा में अविश्वास वी झलक देखकर कालो भी सोच म पड गया और उसन॑ मूह दूसरी आर फेर ल्या । लेकिन जब जीतू ते अपना प्रश्न दोहराया ता वह उसका कथा धपथपाता हुआ बोला जीतू अपने धर म वठकर दुनिया बहुत वडी नजर आती है लेक्नि गरीब
आदमी के लिए यह हर जगह तगर है ।' फिर वह बात पलटने के लिए ताई निहाली से बोला
घरती घन न अपना ३३
कहता ४
ताई, जीतू को दो घूट चाय के मिल जायें तो इसके अन्दर गरमायश (गर्मी) हो जाएगी ॥' ताई निहाली सोच म डूबी हुई बोली घर में गुड तो है चाय वी पत्ती भी मिल जाएगी लेकिन दूध कहाँ से आएगा ? चौधरिया के घरा स नो रूस्सी भी बहुत मुश्किल से मिलती है दूध कौन दंगा ? गली म मु के घर मे भस है । वहा से दूध तो क्या खाली बतन भी वापस नहीं मिलेगा। नानो को ताई निहाली के ये शाद बहुत बुरे लग । छेक्नि साथ ही उसे यह एहसास हुआ कि ताई ने जो कुछ कहा है वह सच है । चानो अभी सोच ही रही थी कि क्या उत्तर दे कि काली यट से बोल उठा मेरे घर म दूध है। सवेरे चाची कही से लाई थी। मैं दौडकर ले जाता है । काली के जाने के बाद ताई निहाली परमात्मा को याद करती हई ज्ञानो से कहने लगी जीतू की तरह काली का बाप भी बहत छोटी उम्र मे मर गया था। वाली बचारे को तो उसकी शक्ल भी याद नही होगी। इसका बाप बहुत हौसले वाला आदमी था । पहल्वानी करता था | इज्जतदार बदा था। जौधरी भी कम ही उसक मुह आत थे । थाना तक उससे डरता था | शरीफो का शरीफ जौर बदमाशो क्य बदमाश था | काली की माँ भी उसके वाप के मरने के दो साल वाद चल बसी । प्रतापी बचारी ने चप्पं गिन गितकर पाला है। बहत थच्छा ल्डका है। जीतू से तीन महीने वडा है। बाहर से तगडा हाक्र आया है। चाना ताई निहाली वी बातें वहुत दिलचस्पी स सुन रही थी । जब काली वापस आया तो वह झेंप कर आगमन म चली गई । ताई निहाली दूध लेकर चाय बनाने क' जिए आगन म आ गई काली दरवाजे भ सक गया और चारा ओर अच्छी तरह दखने के बाल जीतू क पास आ गया । उमने जेब स एक बहुत छाटी सी गठडी नित्राली और उसम से छोटी सी शीशी निवालवर जांतू को टिखाता हुआ बोला जमी तर नाव व अठर यह दवाई लगाता हूँ। पहडे तो यः हद करेगी, फिर एक्टम आराम भा जाएगा । बाटी न कृषड का एक टुकटा शीशी मे भिगारर कुछ बूदें जीतू व नाव से सडगाए दा ॥ जीतू द* से बराहन लगा ओर हाथ मुह पर राद लिए ३ सयर कर अभा आराम आ जाएगा । काली न उसका हाथ मुह के उपर से उठा तिया । 7 चार बूदें नाव से वहव॒र जातू के ऊपरी हाठ पर फ्ए गइ
डे धरती घन न अपना
और कुछ गले मे उतर गइ। उसने उह चाट लिया और बुरा सा मुह बना कर बोला दारू (शराय) है ना २?! और फिर एकदम खुश होकर बोला यह तो ठेके की शराब भालूम होती है ॥' काली उत्तर म मुसकरा दिया और शीशी को क्पदे म ल्पेटवर जेब मे डाल लिया । जीतू ऊपरी हाठ पर जवान फ्सता हुआ बोला यह तो एकदम ठेके की है । देसी का तो स्वाद ही और होता है ।' क्यली उत्तर मे फिर मुसकरा त्या । जीतू उठकर बठता हुआ बोला चाय पीकर क्या कलेंगा । इसो के दा घूट दे दो । दद कम हो जाएगा ।' उसन हठ से कहा । काली ने मुसक्राते हुए उसके मुह पर हाथ रख दिया । ताई निहाली चाय लेकर जाई तो जीतू ने बेदिली से दो घूट पिएं और फिर लेट गया । ताई उसका सिर दवाने लगी | उसके बूढें हाथा म इतनी ताकत नही थी कि जीतू को राहत पहुचा सके ॥ काछी ने ताई को उठा दिया और स्वय जीतू का सिर दवाने छगा । चानो खाट की पायेती खडी थी। काली कभी कभी वनेखिया से उसकी ओर देख लेता | थोडो दर के बाद जीतू ने आख योल दी और एक बार फिर ऊपरी हांठ पर ज़बान फेरन लगा। गुड वी मिठास के स्वाद पर उसने बुरा सा मुह बना लिया । काली न जीतू के उपर झुकत हुए दबी आवाज म॑ पूछा चौधरी के खेत म॑ जानवर क्या तून हके थे ? नही मैं तो उस सम गढी के भटठे पर था । 'तो फिर क्सिन हाके थे ?' 'मुझे पता नहीं । जिसकी जी चाहे सौगध दे दो। काली के इन प्रश्ना से जीतू परेशान-सा हो उठा | मयू न तुम्हारा नाम क्या लिया। काली ने पूछा | मगू का नाम सुनकर चानो चोकती हो गई और जीतू की ओर घ्यान स देखने लगी कि वह क्या उत्तर देता है । वह उठकर बता हुआ बोला
इसलिए कि मैं उसे अच्छा नही लगता । मैं उसवी चौधर नही मानता । इसलिए वह मेरी जान का दुश्मन वना हुआ है।
वाली चुप हो गया। जीतू छेटता हआ बोला 'तुम गाँव म॒ रहागे तो जल्दी ही मगर के रग ढग देख लोगे । ज्ञानो भयभीत नज़रा से काली के गम्भीर चेहरे को देखती रही । वह नही
घरती धन न अपना प्
चाहती थी कि काली और मग् में किसी प्रकार का बैर भाव पैदा हो। वह अपने मन को किसी दूसरी ओर लगाने के लिए जीतू की याट के नीचे पड़े खून से लिथडे कपड़े वे टुकडो को उठाने छग्री
ताई निहाली ने एक दो बार चानो को भना क्या लेक्नि जब वह उह समेटकर वहा झाड्ू लगाने रूगी तो ताई प्रफुल्लित होकर बोली
धुत्तरा, रब तुम्हे भाग (भाग्य) ल्गाएं। तुम्ह राजा घर मिले । वाई उसे आशीर्वाद द रही थी कि दरवाजे पर जोर की ठाउ र पडी और मग्रू बदमस्त साड की तरह अन्दर घुसकर जीतू की खाट के पास आ खड़ा हुआ | चानो ने झाड, वही छोड दिया और घबराई हुई दरवाजे बरी ओर बलने लगी | जीतू बेचनी से खाट पर करवर्टे बदछने लूगा।
भंग भानो को देखकर ऊंचे स्वर मे बोला
तू यहा क्या कर रही है । घर चल तेरे टुक्डे करके जमीन में गाड दूगा। ज्ञानो डर से दीवार के साथ सटक गई और उसके साथ साथ रेंगती हुईं दरवाजे वी आर बढने लगी । वह नही चाहती थी कि काली के सामने मगू उसका अपमान करे | वह भगू के बराबर पहुची तो उसने छाठी का सिरा उसके पेट मे चुभों दिया । चानो चीखती हुई बाहर दौड गई । काली को मगू की इस हरकत पर बहुत क्रोध आया लेक्नि वह चुप रहा । ताई निहाली मगू को झिडकक्ती हुई बोली
'कसा वेदर्दी है क्साइ की तरह मारता है। वंचारी जीतू वा हाल पूछते चली जाई थी। फ़िर वह उसे समझाती हुई बोली ।
'मंगू पुत्तरा देख | वरावर की बहन पर हाथ नही उठाना चाहिए। ताई निहाली अभी अपनी बात पूरी भी न कर पाई थी कि वह बीच मे ही बोल उठा
“चुप रह माइ ज़्यादा बातें न वनाया कर । और वह लाठी के सहारे जीतू वी खाट पर झुकता हुआ बोला
जीतू क्या मुकर कर रहा है अभी तो कुछ भी भार नहां पडी है। अभी तो थाने वा? तरी हष्टिया वा सुमा बनाएगे । फिर उसने ताई निहाली स
कहा
भार तूने व्म सिर पर चढ्ा रखा है । उठा इस वफार चारपाई तोड रहा है । सगर शत थाने ता प्रदुच गद हो वे मर मारकर इसे टिंय मो तारे और रात वा सूरण टठिखा देगे। चौधरा क खत म बाद ल्गाद जा रही है । इस वहा यहाँ चला जाए | चोघरी छुश हां जाएगा ।
३५ घरतो धन मे अपना
भगू ने अभी तक काली से कोई वात नही वी थी । वह उसे ध्यान से देखता हुआ बोला युवा वाली, तुम्हें तो शहर वा राशन घी वी तरह छगा है! मरियल बछड़े जसा गया था और साड वी तरह पल्कर आया है। खर गाव में रहा तो दो महीन॑ में ही सारी चरबी ढल जाएगी । यहा कसी वी हराम को रोटी नहा मिलती । अगर यहा सब हलाल वी रोदी खाति हैं तो में भी चही खाऊंगा ।!' काली ने इतना वहा और चुपचाप बैठा रहा ॥ मगू थोडी दर तक खामोशी से कमरे मे इधर उधर देखता रहा ) जब उम्र की नजर चाय कै' खाली गिलास पर पडी तो वह जीतू की ओर यो देखने रूगा जसे उसका कोई घोर पाप पकड लिया ही । वह भें नचाता हुमा धमती भरे रुहजे मे बोटठा "ऐश कर रह हो भाजकल, चाय पीत॑ हो । दूध वह रंड दे गई होगी। मैं भी सोचता था कि भम्त दो बट्टी दूध देती है लेकिन घधूना फिर भी खाली ही रहता हैं। अभी जाकर उसकी खबर लेता हु । मंगू ने घुरकर सब को भोर देख ओर लाठी पटकता हुआ वाहुर विकर गया! उसके जाने के बाद कुछ समय तक सब चुप बठे रहे । काछी ने जीतू की ओोर देखा और सोच में डूबा हुआ बोला मगर तो बहुत आगे निकल चुवा है । जीतू न बहुत कमजोर आवाज़ म॑ उत्तर दिया आप सारा दिन चौधरी वी दहलीज चाटता है और यहाँ सव पर रोब गॉँठता है । सारे सुहल्से वो शालिया देता है ।न बड़े वी शम, ते छोटे व लिहाज । प्रीतो की लच्छो का दिन दिहाड़ें गली म घेर लेता है ४ यह सुनकर ताई निहाली जीतू के सामने हाथ जोडती हुई बोली पुत्तरा, तू चुप रह | मय जाने, लच्छो के माँ बाप जातें। तुझे क्या लेना है. तरे नाक से तो अभी तक सवेरे की मार से खूत बह रहा है ।' बुछ मप्तथ के बाद वाली उठकर गली से आ गया ) जय पह मगू के घर के सामने पहुचा ता आदर से ज्ञानो की चीखा और मसग्रू की ग्रालियों की मिली जुली आवाज़ें गा रही था । काली कुछ क्षणां के लिए दरवाजे के सामने ठिठक गया लेकिन चीखें और गाल्यिा सुनकर उसके मनप्राण कापने छगे और वह उनसे पीछा छुडने के लिए तेज-तेज कदम उठाता हुआ अपन घर आ गया ।
धरती धन न अपना ३७
है
वाली जब भी वाठडी म छेटता तो उसे यही डर रहता कि छत उसके उपर आ गिरंगी । दीपारें उसे जपन सलय के नीचे दवा लगी । छत जगह जगह नीचे वी जार युरी हुई थी और मर मले जाछे लटक रहे थ । सरकण्डी से मिट्टी गिरती रहती थी । शहतीरा को घुन ने खा लिया था और सरकड़ो वे ऊपर मिट्टी को चूहा न खोखला बरव अपने घर बना लिए थे | छत को खंडा रखने वा लिए वई लठा वा सहारा लिया गया था । फ्शसीला था जौर वोठडी मं हर समय अधी भाख की तरह अधेरा छाया रहता यथा । दीवारें कुबडी ही भर्ई थी और बिंसी समय भी छत समेत धडाम से नीचे गिर सकती थी।
वाली न वोठे वे आदर ध्यान से चारा ओर देखा ओर फिर उठकर छत दर आ गया । छत भी थोदी हो चुती थी और लेप न होने के! वारण उस पर रेत भो विछी हुई थीं । वह सीढी के आखिरी डडे पर खडा चौधरिया जौर महां जना के भकाना और पवतक चौयारा वो देखने रूगा । चमाटडी वे' कच्चे कोठा के मुवावल मं व चौथयार ओर पके मकान वहत ही भर दिखाई दे रहथ। यह बहुत देर तक उनवी आर दखता रहा और सोचने लगा कि वहू भी अपन कोटे थी यतंडवार पका मतान बनाएगा । उस पर एवं चौवारा भी डाल्गा। यह विचार उसव टि्माग मे इतनी जल््टी मज़बूत हो गया कि वह इसे जलती स-जल्टी सावार देखने के लिए बेवरार हो उठा । उसने दिमाग में मकान का नवशा भो वना लिया और नीच उतरता हुआ चाची वा बहुत ऊँचे स्वर म आवाज़ दने लगा । जब चाची न कोई उत्तर ने तिया ता वह आवाज़ें दता हुआ गठी मे आा गया और प्रीता वे! घर से चाची का बुलावर अर छ आया । पाली चाची को खाट पर विठापर स्वयं उसव पांव में बता हुआ बोडा
यायी मैंने एवं बात साथी है।
बया ? साथी न इम ख्याल स सुग हातर बहा वि' शायद काहा अपनी शाटी व बार भ बात वरना चाहता है ।
साया मैं साच रहा हूँ विगाठे को गिरावर पर्दा मत्रात बना रे । यह मत्रान अपना उम्र या घुरा है। वाणी न टूट हुए द्विवाहा, बाही दोवारा और शुत्वा हुई छत की आर सबत बरत॑ द्ुए कहा ।
उगदी बाद सुनवर चादी न हाथ स अटरन रख टिया और आँया से बाती पाएठा ह4 बोटा
पुत्रा तर बाप टाश इसा मान में रट। यहां पहा हुए और यही
द्८ घरतों घन न अपना
अपने श्वास पूर किए । उनके सम मे भी कुछ-न-कुछ टूटता ही रहता था। दीवार गिरी ता नई बना दी। शहतीर टूटा ता उस रुठ का सहारा दे दिया। छत स॑ मिट्टी गिरन लगी तो सरकडे बदल टिए ओर पानी टपक्न छगा ता उपर मिट्टी डाल दी । यह दरवाज़ा भी तर चाचा ने लगाया था बरना पहले ता सरकटा वी टट्टी ही हआ करती थी। तू चार पैसे क्माकर लाया ह तो उह सम्भाल कर॒ रख. कल को तरी शाटी हागी ता काम आएँगे। तू मुझे छप्पड से मिट्टी ला द मैं सार मकान पर लेप कर दूगी।'
नहीं चाची मैं नया मबान बनाऊंगा । सपया खच हां जाएगा ता क्या हुआ, और कमा लगा | काली चाची के घूटन पदंडकर बांटा, चाची, जब तू एनत्र लगाकर पक्का आगन में चर्खा कातगी, तो चोधरानिया भी तर॑ साथ इप्या करेंगी ।
काली की वाता पर चाची खुश थी और साथ ही हेरान भी | वह साच रही थी कि आज छोकरे को क्या हां गया है । यह अनहोनी बातें क्या करन लगा है। भला जाज त्क इस मुहल्ले मं कसी व मकान वा पक्दी इटें लगाई हैं । चाची न मन ही भने मे मिन्नत माती कि काली एसी वाले सोचना छाड द । जब काली न चादी दी अनुमति के लिए आग्रह दिया ता वह अटेरन उठाती हुइ बोली
काका मैं क्या बताऊ । तू जो अच्छा समझता है सो कर। तेरी बकट मरा अवल स वडी है ।
वाली न चाची को बाजुआ म उठा लिया और उसे दो तीन चक्कर दे लिए । चाची कराहती हुई बोली
हट काका, मेरी ता जान निकल गई है। जाड-जोड हिल गया है। मेरे शरारम भव ताकत नहा रही ॥
काली न॑ चाची को खाट पर विठा दिया और स्थय जूता पहनकर चूमता हुआ दूबाना वी ओर चटा गया ताकि मक्यन के बारे मे छज्जू शाह से सलाह कर सके । नए मकान का नक्शा उसके दिमाग मे भिन्न भिन्ने सूरता म उभर रहा था और वह महाजनी की गली म जाता हुआ प्रत्यक मकान को ध्यान से देख रहा था ।
वाला छण्जू शाह को दूकान पर पहुचा तो वहा पर दापी भोड था| शाह सोदा दन मे व्यस्त था। वह क्वाड के साथ खड्य हो गया ताकि छम्जू शाह का नज़र उमर तक पहुँच सक ता वह उसे बदगी कर सके । काली उसे काम बरते हुए दिलचस्पी से देखन ऊगा । दुकान पर ग्राहक को भीड पढ़ रही थो
धरती घन ने अपना हा ड्े६
परन्तु छज्जू शाह वो हर एक पर नज़र थी। क्या मशाल कोइ सौदा लिए बिना वापस चला जाए था किसी को अपने भ्रश्न का उत्तर न मिले । छज्जू शाह को बहुत ज्यादा मसरूफ देखकर वाली निराश हो गया और वापस जान के लिए क्वाड स हट गया | छज्जू शाह की नज़र उसकी ओर भी थी । वह झठ बाल उठा
वहाँ चला बावू काली टास बोरी पर बठो मैं सवको सौटा तोल द फिर बेठकर इत्मीनान से बातें करेंगे ।
बाली थड़ें पर एक ओर विछी हुई फ्टी सी बोरी पर बठ गया। थड़ें के टूसरी ओर बनौलां और खल की खुली बोरियाँ पडी थी और साथ बडा तराजू और बाट पड़े थे। यड के पीछे दालान था जिसके एव कोन मे बजाजी वी अलपरी थी । उसके सामने एक बहुत मली चादर बविछी हुई थी । अलमारी वे' साथ लवडी की सदृबची और उसके साथ लोहे वा गज पड़ा था । टरूसरे कोने मे कई छोटी-बड़ी बोरियां थी । उनके पीछे टीन के छोटे-बडे डिब्जो थी कमर तक ऊँची बतार थी । दालान व पीछे एवं लम्बी और गहरी कोठडी थी जिसवे' अदर घुप अधेरा था| शाह जब कोठडी मे जाता तो या महसूस होता जस वह किसी गुप्ता मे चला गया था। वाली शाह को दयता हुआ सोचने लगा वि स्वभाव से यह आटमी देवता है | क्या बच्चा क्या बूढ़ा, क्या चौधरी क्या चमार सबक साथ जी कहकर बात वरता है और फिर वाम मे इतना छुस्त है जसे इसब घार हाथ हा ।
शाहू अपन वाजु स चहरे का पर्साना पाछता हुआ थड़ पर आया और पल शपरत मे उसने बनोटा बी वई धरियाँ ताट दा । यह वही वी ओर दपर मुसत॒शया और अहर जारर उसकी भार छम्प वा संग रंट और माचिस फ्रता हुआ बोला
काणी दांत तुम मिंग रट पीयो । इतनी दर म मैं इनता द्साव बना दू । पिर निश्चित हाहर दातें बरेगे।
माछी सिगरेट वीता हुआ मसन-द्वीमन में छाजू शाह वा चौधरी हरनाम मिह से मु्तादटा बरतने खलगा | एक गाजी मिट्टी बी तरह नम्त ता दूसरा सूयों मिट्टी को सर ते साद्स । जाला ने छार से सिगरेट को वहा खीचा और अपा आप मे बु“शषाया हि शाह जसे आहमी गे टिए जाने भी घटी जाए ता वाई हज नद्ा
धाशा ”र बे बा” मद गाता का निपशाशर छरजू शयर आपता हवा उशाशर पाए गे ररा पर हहपर घह पर आ ये रा । उसने हे घार बार हक
ही पघरता घत ने झपता
गुडगुडाया और खासता हुआ बोला
'क्यली दास, दर हो गई । क्या करूँ, दृकानदारी पशा ही एसा हू । लालच रहता है वि ग्राहक आया है, अगर चार पसे वा सौदा ले जाएगा तो कुछ बचत हो जाएगी । दुकानदारी नाम ही आई चलाई का है ।'
छज्जू शाह ने अपनी टेंट पर कई बार हाथ फेरा और हुक्के के दो चार लम्बे क्श खीचकर उसने नय एकदम परे कर दी ज॑से उसे अचानक कुछ याद आ गया हो । वह वाली की आर झुक्ता हुआ बोला
“उस दिन चौधरी हरनाम सिंह ने जीतू को नाहक मारा। वहू वंचारा वेक्सूर था सवरे से शाम तक मेरे काम मे लगा रहा था। रात को जब मैंने दूवान बढाई तो वह अपने घर गया था ।*
'मुझे तो समस नही आता हि लोग मारने का हौसला क्सि तरह कर लेत हैं और वसूर न होते हुए छोग मार क्या खा छेत हैं ४ काली यह कहकर कुछ क्षणा तब चुप रहा और फिर छज्जू शाह वी ओर देखता हुआ बोछा, शाह जी, इसम चोधरी का इतना दोप नही जितना मग्रू का है। वह चोधरी के कान भरता रहता है। मैं छ सारहू के बाद गाव आया हु। मेरा उससे काई शरीका भाईचारा नही है फिर भी भेरे साथ दुश्मनी करने एछगा है। जहा मिलता है नाजायज वातें करता है ।
बाबू वाली दास इस गाँव वा हाठ सत्र पूछो | चोरी, यारी निटा, चुगली वहुत बढ गई है। भलमानसी का जमाना खत्म हो गया और लुच्चा वा राज आ गया है।
छज्जू शाह ने खाँस-खास वर गले म फंसी हुईं बलगम नित्राली और गली में थूक्ता हुआ बोला
'कहो, छुट्टी काटने माए हो या गाव मे ही रहने वा विचार है ।
इरादा तो गाँव म ही रहन का है, आगे जा रव जो वो मजूर। शहरा मे भी हालत ज़्याटा अच्छी नही है ।/
हाँ, शहर में गरीब आदमी मारा जाता है। गाँव मे तो फिर भी पछ जाता है। गाँव वे लोगा म अभी तव हमदर्दी है लेकिन शहर म तो आदभी सामने तड़प-तडप कर जान दे ” कोई पानी तक नहीं पूछेगा ।” छज्जू शाह हुवता गुडगुडान छगा ।
काली उसकी ओर देखता हुआ बोला 'शाह जी मरा काठा बटत बोटा हो गया है । पता नहा कस सम बठ जाए। सोच रहा हें कि उस खदेड मर पक्त्ा बना दूँ । इसी बार म आपसे सलाह करने आया था !
परती घन न अपना ४१
छम्जू शाह थी आँपा मे सामने माली या हस रुपये वा मोर एप बार पिर घूम गया। वह उठगर अ>र गया और उराने वाली वी आर ₹म्प था एप और सिगरेट फवा दिया ।
'शाह जी, रहने दो । म सिगरेट बम पीता हूँ। इसमे तो हुबया अच्छा है । बाली ने कहा ।
'बात तो तुम्हारी ठीज है । मन हुतवे' वे! अटावा दो हुक! रसे हुए थे। एवं जाटा वे लिए ओर दूसरा चमारा वे लिए। ऐेविन इस दुनिया मे भात भाँत के लोग हैं। चुछ दिन हुए पार से एवं चमार मरे लिए शाप र छेपर आया था। उसने पीने थे छिए हुवरा माँगा । मन दे टिया लेडित बह भेए॥ सानस जाते सम आँसें वपावर हुवता लूवर खिसक गया ।'
बाली वा सिर शम से झुक गया और वह बुछ दर तव' स्तिगरेद को उंगलिया मे थामे हुए जमीन वा घूरता रहा । छज्जू शाह पं गा साफ वरव' एक बार फिर बलगम गछ्े म थूव दी और वाली से बाला
तुम भवान वी वात कर रहे थे । वाह वाह वड़ा नेत्र झ्याट है। तरे सदवे' चमादडी मे भी एक मवान पवक्का हो जाएगा। तरी इश्जत बतेगी । चार गाँव म नाम हो जाएगा कि घाडेवाहा वी चमाटडी मे भी एक पकत्रा मत्रान वन गया है ।
शाह जी, इस सम मेरे पाम तीन सौ रुपया है । अगर त्तीन सौ म॑ वाम हो जाए तो म वल से ही इमारत घुरू कर दू । कुछ पसा मिछने वाला है ऐदिन अभी उसमे कुछ समय ऊंगेगा। काली न॑ प्रसान मुद्रा से कहा ।
'तीत सौ तो कम है। तुम्हारा धर मते देखा हुआ है । तुम्हारे चचा सिद्ध[ से तो हमारा लेन-देन था। उसने भी एक बार मकान पक्का बरतने वा इरादा किया था। कुछ रपया भी इक्ट्टा क्या था । सौ रुपया मुझसे भी उधार ले गया था। लेकिन तकतीर ने साथ नही दिया । उस सस्ते ज़माने भ शायद इतमे पसो मे मत्ञान बन जाता लेक्लि अब पाच छ सौ रुपय से कम मे वाम नही चलेगा । हर चीतर महंगी हो गई है ।
यह तो बहुत वडी रकम है। इतना रुपया मेरे पास नही है। दाली ने वहुत निराशा स कहा ! छज्जू शाह भी सोच मे पड गया और हुवका ग्रुडगुडने लगा । फिर वह हुकके की ने मुह से हटाता हुआ बोला
बाबू काली दास, मेरी समझ म॑ तो एक सूरत जाती है। वह यह कि गली वाली दीवार पक्की बना छो। बावी पक्के स्तून खडे करके कच्ची दीवारें खडी क्र दो | छत का सारा बोस पके स्तूना पर रहेगा | जब पस हाथ आ जाएँ
डर घरतो धम न॑ अपना
तो वे दीवारें भी पक्नती कर छेना । मैंने भी पद्रह साल पहले इसी तरह अपना मकान वनाया था। अब देख लो, भगवान की दया से उसी मकान पर दो मजल चौवारा है ।' बाली न शाह की योतना वा ध्यान से सुना और समय लिया। उसने एक वार फिर सारी योजना को मन-ही मत मे दोहराया । छज्जू शाह हिसाव रगाता हुआ बोला “इटें गढ़ो के भठठे से मिल जाएँगी । शहतीर और कडियों दा बदोवस्त हो जाएगा। दरवाज़ा के लिए शीशम की ल्कडी के फ्टूटे महायें से ले छेना । मिट्टी पीपल वाले जोहड से खोद लेता / उसने सारा हिसाव लगाकर विश्वासपूर्ण स्वर मे कहा परमात्मा वा नाम टैकर इमारत तुरू कर दो । महीने भर म भवन खडा हो जाएगा । काली छज्जू शाह को बदगी करते थडे से नीचे उतरने छगा तो शाह न उसे बहुत नश्नता से आवाज़ दी । काली पीछे मुडकूर उसवी ओर देखने लगा और सकेत पाकर फिर थडे पर आ गया। शाह ने बहुत ही गम्भीर स्वर भ कहा 'काली दास, तेरे साथ बात करनी तो नही चाहिए क्याकि जो वात गुज्धर गई हो उसके जिक्र से वया फायदा । क्या बात है शाह जी ?! काली ने दिलचस्पी से पूछा । छज्जू शाह बाली वी वात का उत्तर दिए विना उचकक््वर अदर गया। एक ताक से पुरान बहीखात वो याउता-पाछता हुआ उठा लाया और पन्ने पह्टकर एक स्थान पर उँगली रपता हुआ वीला तुम्हारे चाचा सिद्धू ने वारह साल हुए मुझसे मक्नान बनाने के लिए एक सो रुपये उघार लिए थे ॥ उससे व्याज लेना तो मैंने मुनासिव न समझा वयोकि बह अपना प्रेमी था। उसने असल रकम मे से पच्चत्तर रपये ही वापस विए थे और अभी पच्चीस रुपये वाकी थे कि उसे मौत न था घेरा । वचारा बहुत इमानटार आदमी था। मरा बडढें-वडे चौधरिया और साहुकार। से लेन-देन है लेकिन उस जसा ईमावटार आदमी आज तव नहीं देखा । छज्जू शाह ने उस पने पर उंगली रख कर वही बद वर छी और अफ्सोस भरी बावाज मे बोला 'जो मर गया सो मर गया। तुम्ह दखकर मुयये ख्याल जा गया था। आधिर तू उसी खानदान की निशानी है। जब कभी सिद्धू दी याद आती है तो यह बही निवालकर देख लता हूँ । इसमे उसरा जेंगूठा लगा हुआ है। छ्ज्जू शाह अपनी बात यत्म वर छुवा ता वाला वहुन हौसले से वाला
घरती धन में अपना *ड३
'शाह जी, उनकी जगह मैं जो बठा हूँ। आपने मुझे पहले बताया होता। मैं आज दिन ढले आपको पसे दे जाऊँगा ।'
जही नहीं, ऐसी कोई जरदी नहीं। रपये जा जाएगे। अगर वारह साठ बेएतबारी न हुई तो अब दो चार दिन वे' लिए क्या होगी। जब वभी इधर आओ, दे जाना ।'
काली थडे के नीचे उतरने लना तो छज्जू शाह काली को हौसला देता हुआ बोला
“इमारत जल्दी ही शुरू कर दी । वस॑ तो परमात्मा के कामो भे किसी का दखल नहीं है लेकिन हिसाब से अभी बरसात में दो-पौने दो महीते बाकी हैं । हाँ. कमीबेशी होने की सूरत म॑ शर्माना मत। सबके काय करने वाला परमात्मा ही है लेकिन फिर भी बदा बदे का दारू है ।
'आपकी दया वना रहनो चाहिए। आ१ जस छोगो के सहारे गाव मं इपजत से दिन वाटने की आशा है वरना यहाँ तो हर आदमी काटने को आता है । वाली यह कहकर थडे स॑ नीचे उतर आया और शाह की बातो पर मुग्ध गदन उठाए हुए अपने घर को जाने वाली गली की ओर मुड गया ।
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सूप पूर्वी लितिज पर छाए हुए बाटला म स लिहाफ मे छिपे बच्चे वी तरह धाँक रहा था। सुदह वी हवा सुख खेता मे हल्वी-सी घूठ उडाती हुई चल रही थी । चमाल्डी वी र्द्रियाँ और मुत्यारें सिएा पर टोकर उठाए हुए चौधरिया थे घरा भौर हवलिया स कड़ा औौर गोरर उठाने वे लिए धरा से निकल पड़ी थीं। चमाटडी वे मट गज गज वे साफे बाँधे और कमर तेत नीची कुडतियाँ पहन हायथा मे दरातियाँ या सुर्पे पड़ड़े हुए खेता वी ओर जा रह ये ।
बाली गली मे खड़ा अपने बारे वा ध्यान से दखता हुआ नए पवके सत्रान ब' नव व बारे मे सोच रहा था। उस ने चाथी को नया मक्तान बनाने थे बारे मे राजी दर टिया था। वह बुत प्रसान थी शिवाटी वह वास वरन जा रहा है जा उसी सात थादिया से ने हो सता था। व” चमालडी में पहला पता
8 4 परती धत्र न अपना
मकान बना रहा है। वह सारे इलावे मे अपन बाप दादे का नाम ऊँचा करेगा । कोई पथिक चौवारे को दूर से ही देखकर पूछेगा तो छोग बताएँगे कि बह चौवारा मारे के पुत काली का है । चाची यह सोचवर कुछ उदास सी हो गई । वह मन ही मन में साचने लगी कि वाश उस का भी एफ वंटा डिंदा रहता और वह भी चौयारा बनाता । छोग पूछत तो उह उत्तर मिलता कि वह चौयारा भिद्धू के पुत्र का है । चाची वी आखें भर आई और वह अपने पति और पाँच वंटा का याद करने खूब राई। जब उसवा मन बुछ हल्का हो गया तो उसने अपने आपको यह सोच कर तसल्ली दे ली कि क्या वंटा क्या भतीजा--दाना मे कोई फ्क नहीं होता । और फिर काली तो उसका ही बेटा है । अगर उसे जम नही दिया तो क्या हुआ, पाछा-पासता तो है । गाव वे लोग अब भी यही बहेंगे कि यह प्रतापी के भतीजे काली का चौवारा है । काली अदर आक्र चाची स बतन आर दूसरा सामान समेटने वे” लिए कहकर स्वय छत पर जा चढा । उसने छत और मंडरा को अच्छी तरह दखा और नीचे उतर कर सामान पिछठी कोठडी मे रखने छूगा । जब सब सामान बाहर निकाछक लिया गया तो चाची ने एक थम्मी (लक्कडी का मोटा छठ) वे' पीछे से एक पीटली निकाली और उसे अपने नेफ मे छिपा लिया और गली भ खाट विछावर सूत अटेरने लगी । बाली कुदाल लेकर छत पर जाकर मिट्टी खदडने छमा । छत उसके बोझ ओर कुदाल वी चोटो के तले काप रही थी | चादी थांडे थोड़े समय के वाद काली को पुकार कर कहती कि सम्भल कर कुटाल चल्चना। छत बाटी है। कही एकदम नीचे न जा गिरे । गली के सब बच्चे चाची के इद गिद जमा हो गए थे । जिन बच्चा की प्रीतो के बच्चो के साथ दोस्ती थी वे उन के कोठे की छत पर बठकर बहुत नजदीक से देख रहे थे। चाची गली मे उसके गिद मेंडरा रहे बच्चा को सिंड- वती हुई पर रहने वी ताबीद क्र रही थी | वाली को छत उखाडते दखकर गली की वुछ स्क्ियाँ गोद के बच्चा को वमर से लगाए हुए चाची दे पास वा गइ | जो भी ओरत काम घधे से वापस आती वह चाची के पास रझककर छत खदेडन वा वारण पूछती । चाची उसे बडे गव से बताती कि पुरे कोठे वी जगह नया मवान बनाने लगा है। नानो उपले थापने के लिए अपनी छत पर आई तो काली को कुदाल चलाता देखकर सोच म पड गई दि वह अपन कोठे वो छत क्या खटेड़ रहा है। वह टोकरा फक कर गावर भरे हाथा को
घरती घन न अपना ४५
मसलती हुई चाची वे' पास जमा स्त्रियो वी भीड मं था मिछी । चाची रह हढहक कर कह रही थी काली कहता है कि पक्का मकान बनाऊँगा । ऊपर चौवारा डालेगा । इतना ऊँचा कि दो कोस से नजर आए । ज्ञानो बच्चा को पीछे धकेल्ती हुई चाची के बिल्वुलू पास चली गई और गोवर से लुण्डे हुए हाथो से बाल सवारती हुई बोली चाची, चौवारे के वाहर चारा ओर छाल रग करवाना | फ़िर वह दूर से बिलकुल चौधरी हरनाम पिंह के चौबारे वी तरह दियाई देगा । नावो का सुझाव सुतकर वई स्त्रियाँ हंस पडी । भ्रोतो घणाशयूण स्वर मे बोली 'रॉंड सलाह तो ऐसे दे रहो है जसे काली दे चौवारे म इसी वा पला विछेगा ।' नानो की मा जस्सो ने अपनी बेटी वी आवाज़ सुनी त्तो चीखती हुई बोली 'ठहर जा सिरमनिए तरी टागें तोडती हूँ। तुम्हे मैंने उपले' थापने थे! छिए बहा था । तू मुझ से भी पहले यहाँ पहुच गई। नानो गोवर भो हाथ झटकती हुई अपने घर वी ओर भाग गई और छत पर जावर वाली का वुलाल चरात हुए देवने लगी । वह दो उपले भाप लेती और फिर काली वी ओर देखने लगती । उसके पुराने शीशम वे रग के' मज़दुत, सुडौल और भरे हुए शरीर से सानो वी नजरें हटने वा नाम नहां लती थी । फिर वह एक तरह स वाली थे' साथ मुरादला वरने एगी। वह बुटारू वी हर चोट थे' साथ एवं उपला धापने वी कोशिश बरन लगी । उधर कुदाल वी चोट पड़ती इधर वह उपछा थाप कर फर देती । जन वाली छुटाल छोडकर सुसताने लगता तो भानों भी उपले घापना छोड देती | तज्ी से ऊपर चढ्त हुए सूय को देखपर जब वाली तज-तज्ञ घुटाए चरान छगा तो भाना वी उपल थापने वी गति भी उसी द्साव से बढ़ गई भानों ने उपर याप कर कटारा नीचे फय तिया और बाली वी आर टयत हुए भरपूर अंगडाई ली । वटोरा पिरन की जावाज्ञ सुतवर बालो उस वी और दखन एगा और उठी हुई कुटाठ कुछ क्षणा वे! लिए उग बा सिर पर ही रप गई । भाना ने नीच आरर हाथ मुह धोया और अपनी माँ बी आवाज वा अनसुता बरती हुई गटठी में आ गई । बाटी भे॑ घर वी आर जात हुए उस अचात-सा डर महसूस हुजा । वाना में अपन भाई मगू की चिडरियाँ और गालियां गूजन लगी । लविन उरान दस
हम घरतो घन न अपना
भय वो सिर हिलाकर यटर दिया और अपनी कमीज वे! ऊपर चढाएं हुए बाजुआ को खोल्ती हुई चाची वे' पास जा खडी हुई | उस प्मय चाची वे पास केवल दो तीन बच्चे खडे थे और वह इत्मीनान से अटेरन चछा रही थी । ज्ञानो को देखकर चाची बोलो, 'कौन, ज्ञानों है ? इधर आ मेरे पास बठ॥ चादी ने आग्रह करत हुए कहा । चाची, मैं यही ठीव ह,.' ज्ञानो सामने वाली दीवार के' साहरे खडी काली की ओर देखती हुई बोली । चाची ने अटेरन छोडकर कहा काली पक्की इट क्या मकान बनाने छगा है। रब इसकी उम्र लम्बी करे ।/ ज्ञानो चाची की बाता स॑ बेपरवा वाली वो बुदाल चलाते हुए देखती रही । थाडी देर के वाद उस ने कुदाल फर दी और भुडेर पर शुक्ता हुआ बोला चाची प्याप्त रूमी है, पाती पिछाना | चाची अटेरन रख कर उठने छगी तो नानो झट से बोल उठी चाची रुहर जा। मैं रस्सी राती हू । “रहने दे लस्सी । तेरे घर मे फिर कलेश बढेगा ।' भांनो चाची को रोबते रोकते अपने घर वी ओर भाग गई । वाली ने फिर पानी मांगा तो चाची बोछी
'काका, ज्ञानो अपने घर से तुम्हारे लिए लस्सी लेने गई है। बस आती ही' होगी ।!
वाली ज्ञानो की प्रतीशा में अपनी आशा पर हाथ वी छतरी वनाकर गली म देखने लगा ।
थांडी ही देर के बाद भानों गाटी लस्सी मे नमक मिलाजर छौटा भर लाई आर चाची वी भार वढाती हुईं बोली
ले चाची, लस्सी । नमक मैंने डाछ दिया ह ।!
अब तू ही पिला दे। मैं ता उठती उठती दो बल छगा दूगी ४ चाची ने अटेरन उठात हुए कहा !
ज्ञानो एक हाथ म ल्स्सी का लोदा और दूसरे हाथ मं पीतछ का गिलास पकड़े सीढी के आपिरी डडे पर जा खड़ी हुई और झेपते हुए लस्सी से भरा गिलास काछी के हाथ म थमा दिया । बाली गटागट ल्स्सी पीने छगा । चाना उस क॑ तख्ते वी तरह चोडे चकले सीने पर बाला म वह रही पसीने की नदी व्) देखन लगी । उसके सब पट्ट तने हुए थे। वाला पर महीन मिट्टी वे' कण आम वे बूर वी तरह विखरे हुए थे। उसने छस्सी पीफर गिलास शुकाया तो
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उीशनन्पन
चानो की नजरें भी साथ ही झुक गई । उसने दूसरा ग्रिलास भर दिया। काली चुसक्याँ लेकर लस्सी पीता हुआ बोला 'ऐसी स्वाद रस्सी जिंदगी म पहली बार पी है । शहर मे तो लस्सी पीने का विल्वुल मजा नही आता था।' ज्ञानो उत्तर म मुसकरा दी कौर धीम॑ स्वर में बोली अगर हस्पी पीने का इतना ही शौक था ता गाव छोडकर क्या गया था? यह सुनवर वाली खिल्खिलाकर हस पडा । भानो मुसक्राती हुई सीढी से नीचे उतर आई और गली मे जाकर चाची वी पायतो बठ गई । नानो, इधर आकर आराम से वठ। चाची ने अपने सामने पडी सूत वी अट्टिया को समेटत हुए कहा । चाची में यही ठीक हूँ । चानो ने कहा । वह कभी वाली वो कुदाह चलात॑ हुए देखती और दृभी सूत के उल्माआ को दूर करने मे चाची का हाथ बेंदने लगती । दोपहर तक काली ने छत का बडा हिस्सा गिरा दिया | जव धूप तेज हो गई तो वह नीचे आ गया । उस समय तक उस के नया पका मकान बनाने वी खबर मुहल्छे म हर आदमी तक पहुच गई थी। जो भी मद खेतो से धर वापस आता तो उस के घर वाले उसे सत्र से पहले यही वतात कि काली नया पता मशान बना रहा है। वे वुएँ से आत-आते काली के' पास रफ़्क्र नए मवान थे' बारे म बातचीत बरत | वाली को उन के प्रश्ना वे उत्तर देकर अजीव सी खुशी महसूस हांती । वाली न भी नहा धोतर खाना खाया और वोठडी ने दरवाजे म छोटी खाद विछागर लेद गया । हवा के झात़ा से छव पर विधरी हुई मिट्टी उड-उड कर उसके ठपर गिर रही थी । तथ घृूप म आकाश की मीलाहट घुल गई थी। बाली वा दिल चाहता था वि अपने मवान ये वारे म विसी से बात करे। जब यह ध्याटिय और धूप दोना असटय हा गइ तो वह छोटी सी खाट उठाउर तविए मे चरटा गया ।
चंद घरती घन न अपना
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चम्मादडी दे बाहर चो के पार साइ भुल्ले शाह का तकिया था। तकिए के चारो ओर शीशम के वृक्ष और ऊँचे सरकडा वी घनी बाड थी | एवं ओर बड दे दो वृक्ष थे और बीच मे शायद इस गाव से भी पुराता बहुत बडा पीपछ था| इसवी दाढिया झुक्क र ज़मीन पर भा लगी थी और उनमें से कुछ ने जड़ें पक्ड ल्गथी। तकिए में एक भोर एक टूटी हुई पुरानी क्बर थी जिंसवे' बारे म॑ मशहूर था कि कह परमात्मा को पहुचे हुए पत्रीर साइ भुल्ले शाह वा भमजार है। कभी क्भार वोई दुखियारी, वीमारी या कप्ट वी मारी या फिर गोद हरी होने की आकाक्षा पूरी कराने या दुश्मन को मात देने के लिए इस क्बर पर शाम को सरया के' तेर का दीया जला जाती । इसके चारो आंर तंल गिरने से बड़े-बड़े काले और चिकने धर पड गए थे । इद गिद झाड़ झेंखाड की धनी बाड़ थी और उसमे मजार तक जाने के लिए छोटा सा रास्ता था। मजार से हटकर एक छोटा सा पक्का कमरा था जिस सुद्दत हुई कसी ने मनोकामना प्री होने पर बनवाया था। कमरे वी छत गिर चुकी थी। इसके एक कोने में छोटा सा गढ़ा था जिसम दिन भर उपछो की आस सुझगती रहुठी थी ताकि हुकका पीने वाले लोग अपनी चिल्म भर सके । कमरे के वाहर एक घटा पडा था । चमादडी वी औरतें आतं-जाते कुछ उपले फ्रेंक जाती थी औभौर घडे में पानी भर देती थी। चमादडी वे” मद शीश्षम वे वृक्ष न नीचे अपने ढोर-डंगर बाधते थे और स्वय पीपए' की घत्री छाव के नोबे खाट या वपडा जिछावर आराम दरत थे, गप शप रूगाते थे जौर ताश और चौपट खेल्त थे । पाली अपनी खाट लेकर पहुचा तो वहा वोपी रौनक थी। धूप के' सताएं और थकावट से चूर छांगर सा रहे थे, कुछ ऊँघ रहे थे ।
जीतू बन्तू संतू ओर बंग्गा ताश खेल रहे थे। काली की देखते ही जीतू न आवाज दी
बाबू जी, इधर भा जाओ ४'
जोतू वाली को उसकी बार जमाता वी तालीम बौर शहर मे छ* बव गुजारने के कारण बादू जी कहता था । बह उनके पर एहुच को आारः ने उसे दवाथा हाथ छे लिया | जीतू ताश की गड़डी दोनों द्वाया मं थामकर बोला
वातयए, बावू जी पवरए मशान बनान छगा है | ऊपर चौबारा भी रहेगा; अब बाजी दादु जी वे चोबारे से ही एप करेगी ।
घरतो धन न अपना
जीतू वी बात सुनकर जौर वाली को वहाँ देखकर ऊंधते हुए लोग उठवर उनवे' पास आ गए । हर आदमी इटो, गारे, चूने लक्डी इत्यादि के बारे में सलाह दे रहा था। दे गाव वे' कुछ मकाना को उदाहरण के तौर पर पेश कर रहे थे। पाली खुशी से फला नही समा रहा था ) जीतू ने ताश की गडडी वो कपडे मं बाघ दिया और अपनी छाती पर हाथ रखता हुआ बोला बाबू जी, मेरी मदद वी ज़रूरत हो तो बता देना । एक वार मकान वो क्षासमान तक उठा देंगे ।' बावा फत्तू भी अपनी छोटी सी चइरमराती हुई खाट उठाकर उनवे' पास आ गया। गाँव म उसवी आयु के बहुत ही कम लोग थे । वाली वाबे को देखकर उठ खडा हुआ जौर उसवी खाट पक्डवर उस जगह रख दी जहां बहुत ज्यादा घनी छाँव थी । वावा फ्नू खाट पर बठकर बोला गविसके' मकान की बात वर रहे हो ? वाया काली ने इमारत शुरू वी है। जीतू ने ऊंची आवाज़ मे वहां। जय वादे फत्तू ने बात को छूत हुए हाथ हिलाया तो उसने और भी ऊँची जावाज मे अपनी बात दोहराई। अच्छा अच्छा । बारे फत्तू न बाली वी ओर हाथ बढाते हुए कहा । वह उसकी आंर झुव' गया और बाया फ्तू उसकी पीठ थपथपाता हुआ बोला यह तो बहुत ही अच्छी बात है । सारे मुहल्ते म एक भी पक्रा मजान नही है। तुम्हारा पप्रा मकान बनने से मुहल्झे वा सिर ऊँचा हो जाएगा। यह सब आप थुजुर्गा वे! परा वा प्रताप है । वाली वी बात सुनाई न दी ता चह अपना वान उससी आर वहाता हुआ बोरा मर बाना व परें तरबुज़ व खप्पर वी तरह माटे हा गए हैं । भव बहुत ऊँचा सुनाई दन लगा है। बाली ने अपनी बात दोहराई तो बाव फत्तू बा पायरा मुह खुल गया और उसने वाली व सिर पर हाथ परत हए कहा जीता रह गाया तरा बाप ता सद मरमान दिल मे ही टकर मर गया धा। अगर पल्ले ब॑ चार पस टिरान से खच हा जाएं तो समझा सय भा गए वरना इस पट ब टाजय म ता हर चाज जलार भम्प हो जाता है। वावा फत्तू बुछ दर तर घुप रहरर फिर बोटा पैसे भो डिस्टगी मे वाशिए सा बटते वी । हिल रात महतत वी । तह मतों मं शाम तिया | नि मे रश्सियाँ दवाई शाम व थास खाल्प्र बयां ।
भू० प्ररतों घन ने मपना
रात वो भी बही मजदूरी का काम मिल गया तो नींद खराब बरबे' वर लिया छेक्नि पता मवान बताने का अरमान पूरा नहों सका गाँव में मेहतते तो है, कमाई नही ।' अतीत वी एवं कामना मो याद करने बाव फत्तू वी आखा मे आाक्षु छठक आए । आस-पास बठे हुए छाम सोच म पड गए और काली का दिए भी भर आया । “कान बन जाए तो मुत्े जरूर दिखाना । वादे फत्तू न अपने जजबात पर वाए पाते हुए वहा । मकान ही आपवा होगा, वावा जी १ काली ने नम्नता से कहा और बाये वी जार झुकता हुआ बोला वअभी ता अगली दीवार पक्की बनाने का इरादा है । बाकी दीचारें पकने सतून बमावर कच्ची ही बना दूगा । वाद म जब पसे हाथ था जाएँगे तो दे दीवारें भी पक्की कर दूगा। काली वाव फत्तू वे साथ वाता म व्यस्त था कि तक्िए म एक ओर से गाल्या दने वी आवाज आने छूगीं। सब छोगो का ध्यान उस ओर चला गया | सब उस आवाज़ को पहचानते थे, उस आवाज़ वे' माल्कि को जानते थे। मगू, निक्कू के बेटे अमछू की गालिया दे रहा था क्यांकि उसकी भस वी पीठ पर घृष पड 'रही थी । मगू बक्ता-झकता भस॒ को छाया म बाधकर वहा आ गया जहा सब लोग बढे थे। ममरू उसके पीछे-पीछे खाट उठाकर था रहा था ॥५ मगू काली के पास आवर बोला आज क्या छत पर भस॑ नावे थे जो उसका एक हिस्सा गिर गया है ।' नही मैंन आप गिराया है। पवका मकान बना रहा हूँ !! काली ने विश्वास भरे स्वर म॑ कहा ।
या कहा ?' मगू खिल्खिलाकर हँस पडा और एक आर लेठे हुए घुम्मन को सम्बाधित वरता हुआ बोर
'घुम्मना, सुना तून ? काली पकक्वा मकान बना रहा है ।'
घुम्मन मदन ऊपर उठाकर क्मजोर-सी आवाज में बोला
क्या कहा ? काही मकान बना रहा है ?!
नहीं हवेटी बना रहा है जिसम आसामिया और तेरे मरे जैसे कम्मिया की
क्चहरी रगाने और दाद फ्रयाद सुनन व लिए एक दीवानखांता भी होगा। मगू यह वहवर वाले स बीला
क्या शहर म डाते डालता रहा है जो गाँव आत ही पक्का मकान बनाना धरतों धन न अपना ५
गुट पर टिया ? दूसरे गौय से भी छोग शहर रहूरर आए हैं। परत माता! तो क्या, विसी था प्रात शूल्द्ा भी नदी घना । घुम्मन, मंगू भी हर वात पर घ्तिर हिशा रहा था। मगू अपगी था। धारा रपता हुआ बारां “मरे भामा पा साएा कौज मे गाय! था-सिपादिण। बे ऊपर अफ्यर | सारी उम्र बड़े-यड् शद॒रा मे रहा। इगत बढ्नयष्टे शहरा से जिम हमार गौव जसे सरड़ा गाँव समा जाएँ । टिल्टो दसौर (दरावर) तर यह घूम आया है । लेविन जब से बचारा पौज से वापस आपा है रोटी के छिए भी तस रहा है । मगू वी आवाज गुनत्र सोए हुए छोग भी उठ गए । ताश और घौपट नी वाजियाँ ठप हो गई और सवता विश्वास होने छएगा वि मंगू और गाठी मे हगडा हो जाएगा | सब भहगूरा बर रहे थे वि मंगू ज्याट्ती मर रहा हैं एप्रिन डर ने मार चुप थे। वाली बमजो र यही था तगड़ा एम्वा शरीर जो मान पी छत तन जाता था । यह मंगू थी ओर एक्टव' देखता रहा। बह बात पलटने वे लिए बाबे फत्तू से बातें करने छगा | छेदिन मगू उस गधे को झश्नोडता हुआ बोटा बाली, रुपया बाफर है ता घुछ हम भी दे दे । वया उसकी शराब पिएगा ? बाली न भोध से वहा । परीद वर तो ठेवे वी शराब पी जाती है और वह नामद लोग पीत हैं । तुम्हारी कमाई हराम वी है, इससे तो मैं कुछ और ही करुंगा ।' मंगू मे छाती तानकर कहां । वाली ने उसवी ओर घूरकर देखा तो वह तिनववर बोत्ा 'मेरी तरफ ऐसे देख रहा है जँस मेरा सात पी जाएगा। मगू ने! साथ बर बरके इस मुहल्ले मे कोई नही रह सकता । मंगू की ये बात सुनकर बाबा फत्तू चुप न रहा सवा | य६ उसे समझाता हुआ बोला मगू क्यो छाग वी बात करता है । खुश नही होता कवि हमारे भुहल्ले में भी एवं ऐसा आदमी निकल आया है जो पक्का मकान बना रहा है। “चुप रह बुडढे, हर सम अपनी दर टर लगा रखता है ।” मगु ने बाबे फत्तू को झिंडक दिया | वह रूहासा सा होकर शिवायत भरे स्वर मे बौला 'इस छोकरे को न बडा की इश्ज़त का गस है न छोटो वा लिहाज । शिकारी बुत्ते की तरह पजे झाडकर पीछे पड जाता है ।' यह सुनकर भगू और भी ज़्यादा भड़क उठा “चुप रह बुडढया, तू मेरी एक धौर की मार है।!'
प्र धरतो घन में अपना
कपती की आँघा में शरर चमत | $ उसरी मुद्रियाँ बट हवोव रागा | उसके चहर से साफ पता झुसता था दि यह ऊस खुल व घुँट पी रहा है। वाह मे शोध से वॉपनी हुई आवाड मं वा 'भगू, तू मेर साथ वात वर खफा था । बीच मे बाब वी वपा पपीट एोया। बह तुम्हारे बाप दे समान है ।* है तर बाप के समान द्वोगा जिमन अपन बाप दी शव” भी नदी दपी। मगू ने यह बह तो दिया टेबिन बारी के यर वे पजा # हर छुए हुए दवाव देखकर इर-सा गया । बई छोगा ने दवी डराने में मगू मे वहा वि यह च्स झगड़े भ माँ याप वो दीच भ कया शाता है । वीच-बचाव बरान दे रिए बहुत से लोग एवं सात्र बोट रह थे। जीतू घाहता था कि बारी भगू से शिड छाए और उसरो पीद दे । बाय पलू वे पढ़ेगे बुछ नही पद रहा था और वह बिलर विदर हर एक चेहरे थी भार देख रहा था ३ उत्तने अपन पास खदे जीतू से पूछा तो उसे भाई उत्तर ने दिया। बत् स पूछा तो उसने 'ुछ नहीं बहसुर टाछ दिया। घाउ फत्तु ने बागीन्बारी हर एव से पूछा लैविन विसी ने उसे कुछ ने बताया । वह हताश होवर ऊँच स्वर मे बोत्ा 'सब णने कौए वी तरह बॉ-या 7 रहे हैं। भुझ्ते बहन हैं वाई बात नही ।' बाय फत्तू अपनी हाढो टटोल्कर उठा रक्तित वार्ी से उस फिर याद पर जिठाने हुए कहा बाबा जी, वढो । आराम से लेटा । बात खम हो गई है ।
मंगू वहाँ से उठकर परे चला गया । वाषही अपनी घाट पर आओ यैदा। जीतू उसकी और एक्ट्क देखता हुआ धीप स्वर प॑ बाटा
बाबू जी, तू तो पववा शाहरिया बनढर आया है। बाज तू बिलडुछ शहूरिया वी तरह उड़ा है | हबाएई
ई फेर ही विए | भज्जा तद भा थमर मर मे सारे दाँत उसकी झोलों म छाल रता ॥
बाली व जीतू को काई उत्तर न लिया और ताश पता हुज्ना बार एक हा बाजियाँ हो जाएँ। न
जीतू ताश के परत फेंटने लथा तो वाफी शीघ्र ही, ही ही ही हु, रा हा हा करते
एप की उनके बाय आय थए और जब दिम इल गया तो काली ने ताश
हैए साथ के बसा पर छी गए |
जीतू + हाथ भ गी
यमा ही और अपर्त
खाट उठाबर बोला 43 परछाईया रूम्दी हो गई हैं। जाबर का गुल करे [!
धरती धन ने अपना
बाठी अभी सरिए मे अहर ही था जि मगू मे बार पत्तू भी घाट को ठापयर मारते हुए बहा
'बुडडया उठा याट यहाँ से । बिता जगह पेर रसखी है । अब तू यर्ज न भ्राया कर। वाली मे' चौवारे म दोपहर वाटा मर ।
इसवे साथ दो तीन ठहावे' गूज उठे और कापी दूर तब वाली वा पीछा करते रहे ।
८
दो दिन भे ही घारी ने डपोदी छदेड दर सलवार सुफ बर दिया । उसने जगह वी हूम्बाई चौडाई का अनुमाव श्गाक्तर मकान वा नक्शा बना छिया आगे ड्योटी इसके पीछे आगन जिसमे एक ओर रसोईघर, दूसरी जोर एक कोने में सीडी और फिर एक खुली कोठडी ! उसका जी चाहा कि उसके आँगन में भी बसा ही हैडपम्प हो जसा पादरी के घर म॑ है। उसे बार-बार झ्यालर आता कि कोठडी के उपर एक चौबारा भी होना चाहिए जिसमे चाएण शोर रगदार शीशो वाली खिडकियाँ हा और उनसे फर फर हवा आण जाए। वाली जब चौबारे वे बारे मे सोचता तो वह विरकुल आखो के सामने आ जाता लेक्नि जय वह उसे फ़ोठडी के ऊपर देखने की कोशिश करता तो वह उसे दूर तक नज़र न आता । जब उसे यह याद आता कि वह केवल वाहरी दीवारें ही पकक्री बना पाएगा तो उसके दिल म एक खलिश सी उठतो | वह सोचता कि चौवारा न सही पूरा मकान तो पक्का बनना चाहिए । लेकित सांथ ही दिल भ प्रश्न उठता कि इतना रुपया कहा से आएंगा। यह सोचकर उसका दिल बठा लगता और बार वार ख्याल आता दि उसने खाहमुखाह मान गिरा दिया । यदि अब पकता न बना सका तो जग हँसाई होगी ।
इस ओंवेरे म उस रोशनी वी एक क्रिण नजर आती कि शायद छू शाह से कुछ पसे उधार मिल जाएं | शायद वह उसवे' मत की भुराद पूरी पर दे। वाली को याद आया हि अभी उस अपने चाचा का लिया हुआभा उधार भी चुहाना है। इस उम्मीट के सहारे उसते सारा मक्ात एक ही बार पवक्ता बनाने
फट धरती घन न अपना
वा इराटा कर ल्या और जेप मे पचास रपय डाल कर छम्जू शाह पी दृवान वी ओर चला गया। काली छज्ज शाह वी दूकान पर पहुचा तो घोधरी हरनाम सिह और हैंवडा वलोये वा जलदार फौजा सिंह वहा बढठे थे | वे कसी गांपनीय बातचीत म॑ व्यस्त थे । वाली ने तीनो की बदगी की । चौधरी हरनाम सिह और जर दार फौजा सिंह ने काली पर एक उचटती सी नज़र डाली परन्तु छज्जू शाह ते उसका हाए-अहवाऊ पूछा औौर खऊ बनौजे वी दोरिया के पास विद्छे दाद के टुक्डे पर बठन वा सकेत किया। वे तीना आपस में खुसर फुसर करने लगे । काली पहुले तो बेबपर इधर उघर दखता रहा लेबिन जब उसकी बातचीत म॑ रुपया का वार-बार जिक आने लगा तो वह भी कान जह््माकर उनकी बातचीत सुनने वी कोशिश करने लगा । जल््वार फौजा सिंह को रुपया वी जरूरत थी। चौधरी हरनाम सिंह
सिफारिश के लिए साथ आया था। छज्जू शाह वो भरी प्रकार मालूम था कि फौजा सिंह जल्दारी के रोब मे है। थाने क्चहरी तक उसवी रसाई है । जिशा हुवझाम से भी दुआ सलाम है। छज्जू शाह् उस वडी रकम देने से धवडा रहा था क्याकि उसे इस आसामी पर विश्वास नहीं था। लेकिन वह बहाना यह बना रहा था कि उसके पास इतनी बडी रक़्म नहीं हैं। वह ठोस जमानत चाहता था ऐेक्नि जरूदार हाथ उधार रकम चाहता था।जय वात ल्पम्वी होन छग्गमी और उछन्जू शाह दवी जवान म अविश्यास प्रकट बरने रुगा तो चौधरी हरनाम सिह शाह् को समझाता हुआ बोला
शाह, सरदारों की जवान ही सबसे वडी जमानत होती है । इसी जवान
से बड़े बडे व्यापार और रिश्ते नाते तय हांत हैं ।
आप वी बात सोलह आने ठीक है लेकिन व्यवहार भी कोई चीज़ है ।'
छजू शाह न उत्तर दिया ।
जैलटार फौजा सिंह ने जब देखा कि शाह अपनी वात पर डट गया है तो
वह जमानत दन वे लिए राजी हो गया ]
'शाह, हमारे पास जमानत रखन के लिए एक ही चोज़ होतो है और
वह मैं तेरे नाम रहन कर नहीं सकता क्याकि कानून इजाजत नही देता ।
'सर छोटोराम के दनाए हुए झनूत वी बात कर रहे हो ? इसका इताज मेरे पास है। और छज्जू शाह अपना मूह जल्टार के कान के पास ल जाकर बोला
मरे सम्बधी जमीना के माल्कि हैँ | उसके नाम तो आपको जमीन रहते
धरतो अपना धर ने अपर भर
रपी जा सकती है। चणो यह 7 राही, बाबत वाटा जाट जगता मरा अपनों आदमी है । उसपे ताम रहने बरवा देना ।'
जएलार पौजा सिंह और चौधरी हराम रिह चयूतरे व दूसरी ओर चः गए और आपस म राछाटह बरने ये बाट शाह व पास वापस आ गए ।
घौधरी हरनाम सिह बहने रूगा 'जैछएदार बी आठ-दस घुमाआ बजर जमीन है। उसमे से दो घुमाओ ?हने
रख लो ।' अगर वह जमीन रहन रखती है तो सूद भी डबल होगा । जिस जमीन मे घास वा तिनवा भी न उगता हो उसे रहत रखबर मैं क्या कमार्ऊगा ?* छज्जू शाह ने वहा ।
वे तीनो आपस म॑ फिर रालाहे करने ऊछगे और धीर धीरे उनरी आवाज़ धीमी और सिर मिकट होते गए | जब फौजा सिंह अपनी जलूदारी का रोब दिखाने लगता तो शाह इस तरह पतरा बदलता कि जेलदार को फिर शुकना एडवा ! चौधरी हरमाम सिंह जलवार को एक वार फिर चबृतरे से परे ले गया और थोटी दैर के बाद शाह वे' वान म कुछ कहां | शाह में कुछ शणां तक सोचने के बाद चौधरी से एक-दो प्रश्न पूछे और फिर निर्णायात्मकरः स्वर से
बोला
अच्छा जलूदार साहव, आप कोई पराए तो हैं मही। आप इतल्के के मालिक हैं। आप चोधरिया और सरदारा क॑ सहारे तो हम लोग भाँव म इज्जत से दिन ग्रुज्ञार रहे हैं। छज्जू शाह ने यह कहकर दोना! के कान मै पास मुह ले जावर अपना फ्सला सुना दिया । चौधरी और जरूलर दोना घौंक गए लेक्ति छाजू शाह ने उनको एवं शब्” भी वोलन का अवसर ने त्यिा। वह अपनी विजय पर मुसरराता हुआ बोतजा
आप चौधरी टहरे उमीना के माटितर हम ठहरे मजदूर हत्वानिय । आप छोगा के राह्टारे दाल राठी चे जाती है। आप बड़ी स-बडी चाट राह राजते हैं ऐेविन हम एोोग अगर एप वार गिर गए त। दस सारी उम्र नही 5 08 हे कह हे 2 ? छाज शाह ने अपनी बात वी पुप्टि बा लिए
स्स्दाधित बरत हुए वहा । मुसकरर छम्जू गाट पर क्रोध आा के चा् हि हज कल हट आपका चतता हीते कया जता रखा है । क 40000 %०२ मगन क््प्ट ग्ि हैआ बाटा
४५ध परतों धन में अपना
'शाह जी, तुम तो सेठ हा सेठ । दुनिया म॑ दो तरह के ही तो आदमी है एक चौधरी और दूसर॑ संठ ।' वह ठहावे मारो लगा | चौधरी और जलदार एक वार फ्रि आपस म सलाह वरने छगें। चोधरी, जलदार पर शाह वी बात मानने के लिए जार दे रहा था ऐेकित जलदार बुछ हिंचक्चा रहा था। मगू ने काली पर अपना महत्त्व पूरी तरह जताने के लिए इस अवसर से पूरा पूरा फायदा उठाना चाहा | वह एक बार फिर बोरी के पीछे से सिर निकालकर ऊँचे स्वर मे बोला 'जलू्दार साहब, आप शाह वी वात मान लें। इसम कोई हज नही है । लेबिन जब उसने देखा कि उनम से किसी ने भी उसबी बात पर ध्यान नही दिया तो वह वारी के पीछे से उठ आया और उनके निकट आकर बोला 'मेरी बात मात्रा तो शाह कोइ नाहक बात नही कह रहा | फिर वह कोई गर भादमी तो है नही ( भगू ने विजयी निगाहा से काली वी भोर देखा। जब मगू ने महसूस क्या कि इस बार भी उसकी वात को अनंसुता वर दिया गया है वा वह उनवी ओर एक कदम बढ़कर छज्जू शाह वा सम्बोधित करता हुआ बोला शाह जी आप ही पुछ तम पड जाओ ।' मगर न अभी अपनी चात पूरी भी न वी थी कि चौधरी हेरताम सिंह गर जती हुई आवाज़ म बाला धुत्ते वी जौलाद, चुप बठ । कुत्ता चमार अपन आपवो प्रडा प्र समझता है !' छज्जू शाह भी मगर को डाटता हुआ योला मगू क्या मूज बनता है । घडा वी बात म क्या दखछ देता है ।! भगू खिसियाना होकर फिर बनी वी बोरी के पीछे जा वठा और मुह ही म बुदयुदाने लगा । उसने वाली की आर देखा तो उस महसूस हुआ जसे वह उपक्षके निरा”र पर बहुत प्रसन है । वह मुह ही मुह में वाली को गाल्या दता हुआ घमकिया देने लगा । काली गदन झुवाए हुए सांद रहा था कि चौधरी ने मगू का कुत्ता चमार वया बहा | काछी अपने कोध को दवाता हुआ जाने के लिए उठ खड्टा हुआ | लक्गि छ-जू शाह उप्त हाथ से बठने का इशारा करता हुआ बोला बाबू काली दास तू कहाँ चला ? बठा बढो। लो यह सिगरेट पियो। छज्ज् शाह ने रूम्प का सिगरट और माचिस उसकी आर. फ्ेक्त हुए कहा | काली
धरती धन न अपना भर
सिगरेट सुल्गायर प्र बढ गया । संग अप अहर ही अ6र छटर धोखा हुआ अपो पास हाँप रह शियारी कुत्ते वे गट मे पड़े पटटे मो मसने एगा ।
चौधरी हराम मिट न पुत्ते वी चूँ 'ँ पी आयाज शुनी तो मगर गो आयाड देवर पुत्ते के गऐे या पट्टा ढीटा गरा व लिए कहा | मगू बोरी या पीछ रा निवल्यर बोला
'पट्टा तो ढीरा है। बढा-बठा तंग आ गया है।
तो इस हवेली ले जा और पट्टा उतार बर बढ़ा गेट बंद बर दना । घौधरी ने वहा । मयू बुत्ते वी जजीर थाम वाली यो धूरता हुआ चयूतरे से नीचे उतर गया ।
जब जलदार फौजा सिंट और छज्जू शाह वी वात सिरे चढती नज़र न आई तो चौधरी हरताम सिह जल्टार से बोला
जरदार, अगर तू अपनी जमीन रहन नहीं रखता चाहता तो मैं अपनी जमीन रख देता है। जो काम वरना है सो वरना है। दो जरीब जमीत वे पोछे क्या जान दे रहा है।
बह है चौधरिया वाला दिल गुर्ता ।' छम्जू शाह ने सुश होत हुए ऊचे स्वर मेक््हा।
'जलदारजी, मैं याज मे दमडे पाई की कमी वर दूगां लेक्नि मेरी शत आपको माननी ही पड़ेगी । नीति के विरुद्ध जाना मेरा धम नहीं है। भगवान गवाह है भुझे अपनी रकम और याज का फिक नही है, मुझे तो सिफ आपकी जरूरत और दज्ष्जत का ख्याल है। जी खोलकर खच करों। अगर सरदार और चौधरी लोग बच नही केरंगे तो क्या कुम्हार और चमार क्रगे।' छज्जू शाह ने अपने एक एक शद पर ज़ोर देते हुए कहा । जल्दार फौजा सिंह के लिए अब कोई राह नही रह गई थी । चौधरी हरनाम सिंह वा सकेत पाकर उसने हाँ कह दी और तीनो उठ खडे हुए | छज्जू शाह जलदार से बोला
आपको पता ही है वो कायज पत्तर चाहिए । कसी को तहसील भेजवर मेंगवा लेना । मैं इतनी देर भ रकम वा बदोंवस्त कर लूगा ४
चौधरी हरनाम सिंह और जल्दार फौजा सिह छज्जू शाह से दिन नियत क्रबे चबूतरे से उतरने लगे। उहें जाते देखकर काली भी खडा हो गया। चौधरी हरनाम पघिह ने उसकी ओर ध्यान से देखए और उसके हुष्ट पुष्ट शरीर और उजते कषडा का जायजा लेता हुआ बोला
'सुना वाली, क्या हाल है तरा ?! काली थे' उत्तर देने से पहले हो छज्जू शाह बोल उठा
श्प धरती धन ने अपना
चौधरी वालो पका मत्नात बना रहा है ।' चौधरी न एक वार फिर वाली पर नजर डाली और कुछ कह बिता चबू तरे से नीचे उतर गया । जब वह बुछ दूर निकल गए तो छज्जू शाह काली से बोला पबया कया जाय ? चौधरी लोग है जमीना व माल्कि हैं। रुपये पस की जरूरत होती है तो इधर आ जाते हैं। इनकी जरूरत पूरी करनी ही पडती है । अगर न दररो ता कभी दूरनान मं डावा और कभो घर मे चोरी। अभी दो हजार रुपया माग रहा था लड़वी वी शादी के लिए । हाथ उधार चाहता था। यह तो कागज़ पत्तर होते हुए रकम खा जात॑ हैं, हाथ उधार छी हुई कब वापस करेंगे ।! काली अपने मन वी बात बहने वे लिए छज्जू शाह की हाँ मे हा मिलाता हुआ वोला शाह जी इस दुनिया म हर आदमी हाजतमद है | बदा ही बदे वा दारू हैं | इस इलज़े म॑ किसी को रुपये पँस को जरूरत होगी तो आपके पास ही आएगा ।' दादा विसी का बषा वर सकता है । करने वाला तो भगवान है । वादा ता सिफ वहाना बनाता है । छज्जू शाह ने नम्नता से कहा । काली छज्जू शाह वी ओर दखता रहा कि अपन मन वी वात वह डाले । लेक्नि उस हिम्मत नहीं हो रही थी | आखिरवार उसते जेब से पच्चीस स्पय निवाले भौर छज्मू शाह की ओर बढाता हुआ बोला 'इधर जाया था ताकि आपया वे स्पय देता जाऊें जा चाचा ने जाप से क्ए थे। छज्जू शाह इत्रिम ढग से याद करता हुणा ऊँचे स्वर म बोला 'अच्छा अच्छा, याद आ गया ) यह तो दस वारह साल पुरानी बात है ।' शायद इससे भी ज़्याटा पुरानी हो ४ बह तो मुझे पता नहीं। आपने पच्चीस रपय बताए थे सो मैं छे आया हैँ | शुक्नि इसके साथ सूल भी होगा चलो घारह साल का न सही छ साल का ही दे दा। अपन आत्मी से इतनी रियायत तो करनी ही चाहिए । छज्जू शाहन पच्चीस रुपय के नाट तीन चारवार उगलिया म मसलने के बाद बहा । काली याज का जिक्रसुनकर कुछ उठास् सा हो गया वयाकि छज्जू शाह
ने पहले इस बारे मे कोइ जिक नही किया था। काडी प्रत्यत रूप से प्रसन भाव से बोला
घरती धन न अपना ५६...
वितना ब्याज है, शाह जी ? सालट रप्य और दे "। | वस बनत ता पयाटा हैं। छग्जु शाह ने हिसाय टगात॑ हुए बहा | वाली न उसके हाथ मे सारह रुपय और थमा लिए। उसने इन नोटा वो भी तीन चार बार गिना जौर उ'ह कमीज बे नीच बुर्ती वी अटरूती जेब म॑ रखबर बोरा पहले मटवा वा चाँदी वा रुपया चलता था। फिर जाज परचम वा चाँदी वा रप्या आया जय भ दरा रुपये भी हा ता महसूस होता था थि' उसमे कुछ है । अब शायन के नोट भा गए हैं। जेर मे हमर सपया भी डाल लो तो खबर तक नही होगी। छज्मू शाह एवं वार फिर बमीज व आदर हाथ डाल ब्र नोटा को टटोल्कर बोला 'ऐऐसी आप्तामिया को तो जमानत वे बिना सम देने मे भी कोई सफोच नही होता । अगर बाप उधार चुताए बिना मर गया तो बरे ने छुक्ा दिया । कई वार तो ऐसा भी हुआ है वि. दाटा का लिया हुआ उधार पोते ने चुकाया । सलेकक््नि अब जमाना बदए गया है। छज्जू शाह वी बातें सुनतर काली को विश्वास हो गया कि उसे शाह स॑ सपये उधार मिऊ जाएगे। वह कुछ क्षणा तब छज्मू शाह थी भोर देयता रहा और फिर धीमे स्वर मे वोला शाह जी ) क्या वात है वाली दास ?” छज्जू शाह उसके मन की बात को भापने की कोशिश वरता हुआ बोला । वाली ने रुक रुव वर कहा । शाह जी मैं सोच रहा हूँ कि एक ही बार सव दीवारें पक्की कर दूं । बार वार उधघेडने बताने से खच भी ज़्यादा होगा और मकान भी अच्छा नही बनेगा । अगर एसा कर सका तो बहुत अच्छी वात है। छज्मू शाह ने उत्तर दिया । लेकिन सब दीवारें एक ही वार पक्शी बनाने के लिए मेरे पाय रकम बय है अगर अगर आप ॥। काली अपनी वात्त पूरी न कर सका और जब छाजू शाह न उसे हौसड़ा दिया तो वहुत तेज़ आवाज़ म बोला अगर आप ब्याज पर कुछ रुपया दे दें तो काम हो सकता है । 'क्तिनां रुपया दरकार होगा ? मरे पास दो-ढाई सौ होगा | अगर सौ डेढ सौ और मिल जाए तो काम हो सकता है । वाली ने साहिब ल्गात हुए कहा । छजू शाह साच मे पड यया। काली साँस रोफ़कर उसकी ओर देयने
६० घरती धन भ अपना
लगा । उसका दिल, दिमाग, वान, जाख सय छज्ज शाह वी ओर लगे हुएथे |
“इतनी रकम वा बदौयस्त के होगा ?
आप चाह ता सव वुछ हा सबता है। मैं साल दा साछ म व्याज समेत पूरी रकम छुवा दूगा।/
वह तो ठीक है छेक्नि इतनी रफ़्म वहाँ से आएगी। मेरे पास श्पया होता तो जरूर दे देता | विसी जौर से लाकर दूगा तो वह जमानत माँगगा । छज्जू शाह ने कहा ।
आपके पास रुपये को क्या कमी है। मेरा बाम हो जाए ता सारी उम्र आपवा एह्सान मानूगा ।'
“'एहसान की तो कोई बात नहीं । आउल बाम-काज तो रहा नही, चारा ओर मदा-ही मादा है। पुराने समय अब वहाँ। दाल रोटी भी मुश्किछ भ चलती है। भपया कस जमा होगा । छज्जू शाह जावाश वी ओर देखता हुआ बोला। वाली ने अपनो बात जय फिर दोहराई ता छणम्जू शाह सांच म पड गया और कछ क्षणा के वाद गोपनीय स्व॒र मे बोला
'कोइ जमानत के लायक चीज़ है । कोर जेवर 7?!
'वस यहू घडी है । काली ते जेव से पुरानी घड़ी निम्मल्कर दिखाते हुए बहा जो उसने पद्रह रुपय मे खरीदी थी।
यह किस वाम वी ? गाव में घड़ी का क्या काम ? यहां छोग दिन मं परछाइया से और रात को तारे देखरार समय वा अदाज़ा कर छेत है । कोई ऐसी चीज़ बताओ जा जमानत का काम दे सके | छज्जू शाह् अपनी बात पर जोर देता हुआ बाला |
आपने जैलदार को दो हजार रुपया दने का वचन दिया है ।” काली ने कुछ तीखे स्वर म कहा ।
“उनवी बात मत करों। वे मालिक लोग हू, जमीटार है । दो घुमाआ जमीन रहने रख गया है। जव तक उनके पास ज़मीन है उह्े ब्याज पर पसे की कभी नहीं । छज्जू शाह ने अपने एक एक शद पर जोर देते हुए कहा।
उज्जू शाह के शब्टा ने काली की सब उम्मीदा को फूक मार कर उड़ा दिया । उसे समझ नहीं आ रहा था कि शाह को क्या उत्तर दे। उस्न अपने आपको सभाल्त हुए कहा ।
शाहजी आप मेरे मान वो जमीन रहन रख लें । काली वा यह कहते हुए बहुत दुख हुआ और उसे यू महसूस हुआ जसे वह पौधा लगाने से पहुल ही उस जगह पर अमरपेल् का बीज डाल रहा हैं । छज्जू शाह काली को उदासी
घरतो धन न अपना बल र
नो भाँपता हुआ बाला
काली दास जिस जमीन की तुम बात कर रहे हो वह जमीन भी तुम्हारी नही है । वह शामठात (गाँव के ज़मांदारा वी साँझी जमीन) जमीत है । जब तू या तरे वारिस (उत्तराधिकारी) इस गाव म॑ रहेगे, जमीत वा वह टुक््डा रहाइश के लिए तुम्हारा है। बाद म उसका मालिक गाव हांगा। वह तरी मालक्यिती जमीन नही है मोरुसी जमीन है।
छज्जू शाह वो वात सुनकर काली की रही-सही हिम्मत भी जवाब दे गई। उसे महसूस होने लगा कि गाव म उसकी हस्तों शुय के बराबर है। उसबी आँया के सामन अधघेरा छान छूगा | वह कुछ देर तक उसी हालत मे बैठा जमीन को घूरता रहा । वह् तौ साल के बुडढे वी तरहे घुटना पर हाथ रख बर धीरे धीरे उठा और चबूतरे से नीचे उतर आया ॥ छज्जू शाह उसे दिलासा देता हुआ बोल
वाली दास निराश हाने की फोई बात नहीं है। मरे पास सपया होता तो फौरन निवाल बर दे देता । जब मैंन तरे चाचा को दे दिया था तो तुझे देन म बया हज है अभी एक दीवार ही पक्त्री कर छो। भगवान ने चाहा दो साल म॑ ऊपर चौयारा भी बन जाएगा ।
वाली चबूतरे वी ऊपरी सीटी पर रुकवर छज्जू शाह वी यात सुनते छगा। जब शाह ने हुतका गुडगुलना शुरू कर लिया तो वह नीचे उतर पर अहिस्ता अहिस्ता बत्म उठाता हुआ अपने घर वी आर चल पड़ा। उसवे' टिमाग से मवान का नक्भा उतर गया 4 चमराट्टी वे बाहर बुएँ ये निकट गदे पानी यी छपरी के पास आवर बह रक गया । पहले वह यहाँ दुग ध मे बचने व लिए मात पर हाथ रप लिया वरता थां। अब उसने वहाँ खडे होकर साँस जोर से अटर थीचा और फिर उस अहिस्ता-अहिस्ता छोड़ता हुआ छपी पार करवे गटो में घुस गया। गठी में वीचड़ को पाँय तट रॉजला हुआ यह अपन यड़र वा सामन आ घटा हुआ। वह एफ आर पड़े वाई भौर पुराने शहतीरा कृहिया और सिररियों को देखकर भौंचरत्रा रह गया। उसने जमीन वे छोटे से टुरुड वो दया ओर में दूसरी आर पर टिया जस उस मीन के साथ उमा वाई सम्दय नटी था । हिट में घृणा और बवसी से उसके मन व्राद् मिकुड़न एगे । वह जमीते वे टुबड का घूरता हुआ साचत एगा हि यह भी उसत्रा न है । यही करार इस सुलह्नल महर सार मौसी है. चमारा वा बौराट ता मौल्सी है । बाटी गा में हा बद गया और आँखे बट रब मिर टीयार व साथ टय' श्णित
घ्३ घरती घत में अपना
उसे दो आवाज़ सुनाई दे रही थी । एक बूढी और दूसरी जवान । एक उमग भरी और दूसरी किसी हट तक निराश। वह ध्यान से दोना आवाज्ञा को सुनने लगा । ज्ञानो चाची से कह रही थी चाची, मवान वन जाए तो वाली का व्याह वर देना । अच्छी सी दुल्हन लाना--काली की तरह लम्बी और तगडी। कही से कोई बोनी न पकड लाना । घर में बहू आ जाए तो अपना चेखा छत पर ले जाना । पीढे पर बैठे विठाएं रोटी खाना ॥ चानो अपती धुन मे बारती जा रही थी कि चाची उसे प्यार से डाटती हुई बोली हुशत मुटियार लडकिया ऐसी बात नहीं करती । भर फ्रि सोच मे डूबती हुई कहने छुगी सजोग होगा तो शादी भी हा जाएगी । अभी तक तो वह नाम नही लेत देता । उसी उम्र के लडके चार चार बच्चा के बाप हैं ।' चाची और नानो अपने अपने ढग से वाली वे वारे मे बातचीत मं खोई हुईं थी कि खासकर उसने दोना का ध्यान जपनी ओर खीच लिया। चानो शम के मारे जमीत मे गड॒ती जा रही थी । छेक्नि जय उसने काली को बहुत उदास और निराश देखा तो चौक गई और चाची से बोली “चाची, वाठी को क्या हो गया है। वहूत चुप चुप जौर उटास दीख रहा है ।' काका, यहां धूप मे क्या वठा है ।' चाची धवरावर उठी और वाली के पास आकर बोली | चाची वी आवाज सुनकर काली न यू आँख खोली जस काई बहुत डरावना स्वप्न देखता हुआ डर गया था। वाली न चाची और चाना पर उचटती-सी नजर डाली और आगन म॑ आक्र वगल वाली दीवार के साये म॑ बठ गया । 'हो गया बदोवस्त ?* 'नही हुआ ।' काली न निराशा भरे स्वर म कहा । चाची बुछ देर तक चुप घठी रही । उसके हाथ से अटेरन गिर गया । उसने उसे उठाने की कोशिश नहीं वी और काली का दिलासा देती हुई वाली
वदोउस्त नही हुआ तो कोई हज नहीं । पुरा पका न सही, कच्चा-पय्क्ा सकान बता लेंगे ।
काली झुझ्लाई हुई आवाज़ भ बोला चाची, मैंने याहमुखाह काठा गिरा दिया। मेरी तो अक्ल मारी गईं थी । तू ही मुथ्रे मना बर देती ।
घरती धन ने अपना ६३
वो भाँपता हुआ बोला
बाली दास जिस जमीन की तुम्र बात वर रहे हा यह छमीन भी तुम्दारी नही है । यह शामलात (गाँव वे जमाटारा वी साँी झम्ीत) जमीन है । जय तू या तेरे वारिस (उत्तराधियारी) इस गाँव मे रहगे, जमीन या वह टुबडा रहाइश वे लिए तुम्हारा है। बाद म उस्ता मॉलि गाँव हागा। वह तरी मालक्ियिती जमीन नहीं है मौरूसी जमीन है।
छज्जू शाह वी वात सुनवर वाली वी रही-सही हिम्मत भी जवांय द गई। उसे महसूस होन छगा कि गाँव मे उसती हस्तों शूय वे वरायर है। उसर्री जाँजा व सामन अधेरा छान ढगा। वह बुछ दर ता उसी हाटत मे बठा जमीन को घूरता रहा । वह सौ साल वे बुडटे वी तरह घुटना पर हाय रख बर धीरे धीरे उठा और चवबृतरे से नीचे उतर जाया । छज्जू शाह उसे दिलासा दता हुआ बोला
बाली दास निराण होने री बोई बात नहीं है। मरे पास स्पया होता तो फौरन निकाल कर दे देता । जब मैंने तेरे चाचा को दे दिया था तो तुझे देव म वया हज है. अभी एक दीवार ही पक्ती कर लो। भगवान ने चाहा दो साल मे ऊपर चौबारा भी बन जाएगा ।
काली चयूतरे की ऊपरी सीढी पर रुककर छज्जू शाह की गत सुनने लगा । जव शाह ने हुववा भुडगुडाना शुरू वर लिया तो यह नीचे उतर वर भहिस्ता अहिस्ता कदम उठाता हुआ अपने घर वी ओर चल पडा। उसके दिमाग से मकान वा नवशा उतर गया ॥ चमादडी के बाहर वुएँ के निकट गदे पानी को छपडी के पास आकर वह रुक गया । पहले वह यहाँ दुग्ध से बचने के लिए नाक पर हाथ रख ल्या करता था। अब उसने वहाँ खडे हाकर सास जोर से आदर खीचा और फिर उसे अहिस्ता अहिस्ता छोडता हुआ छपडी पार करके गली भ घुस गया । गली म॑ कीचड वो पाँव तले रौंदता हुआ वह अपने खडर के सामने आ खडा हुआ | वह एक ओर पडे बोदे भौर पुराने शहतीरो क्डिया ओर सिरक्यो की देखकर भौचकका रह गया । उसने जमीन वे' छोटे से टुकडे को देखा और मुह दूसरी ओर फेर लिया जसे उस जमीन वे” साथ उसका कोई सम्ब्य नही था । दिल म धृणा और वेबसी से उसके मन प्राण सिकुडने छगे। वह जमीन मे टुकड़े वा घूरता हुआ सोचने लगा कि यह भी उसका नहीं है यही कया इस मुह॒ल्टे म हर चीज़ मौल्सो है चमारा कौ औराद तर मौसमी
है । बाटी गली मे ही वठ गया और थासें बद करके सिर दीवार के साथ टैफ दिया ।
धरे घरती घन न अपना
उस दो आवाज सुनाई दे रही थी । एक बूटी और दूसरी जवान । एक उमग भरी और दूसरी किसी हद तक तिराश। वह ध्यान से दाना आवाज्ञो को सुनने लगा। ज्ञानों चाची से कह रही थी चाची, मकान बन जाए तो वाली वा व्याह् वर दना । अच्छी-सी दुल्हन लाना--वाली की तरह लम्बी और त्तगडी । कही से कोई बौनी न परुंड लाना । घर मे बहू आा जाएं तो अपया चखा छत पर ले जाता पीढे पर बैठे बिठाए रोटी खाना । ज्ञानों अपनी घुन म बोठती जा रही थी कि चात्ती उसे प्यार सं डाटती हुई बोली 'हुशत, मुटियार लडकिया ऐसी बात नही करती । ? और फ्रि सोच मं डूबती हुई कहने रगी सजोग होगा तो शादी भी हा जाएगी । अभी तक तो वह नाम नही लेने देता । उसवी उम्र के ल्डते चार चार बच्चा के बाप हैं।' चाची और भानो अपने अपने ढग से काली वे बारे भ॑ बातचीत मे थोई हुई थी कि खासकर उसने दोनां का ध्यान अपनी ओर खीच छिया। ज्ञानों शम के मारे ज़मीन मे गडती जा रहो थी । लेकिन जव उसने काछी का वहुत उदास और निराश देख तो चांद गई और चाची से बोली चाची, काटी वो क्या हो गया है। बहुत चुप चुप और उदास दीख रहा है |! ब्ाका, यहाँ धूप मे क्या बठा है । चावोी घबरावर उठी और काली के पास आकर बोली । चाची की आवाज सुतकर काली ने यू आँखें खाली जस काइ बहुत डरावना स्वप्न देखता हुआ ढर गया था। काली ने चाची और चानो पर उचटती सी नजर डाली और आगन म ऑकर वगल वाली दीवार के साथे म॑ बँठ गया । 'हो गया बादावस्त ?* नहीं हुआ । काली न निराशा भरे स्वर म कहा | चाची बुछ देर तक चुप चठी रही | उसके हाथ से अटेरन गिर गया । उसने उसे उठाने की काशिश नही वी और काली को दिलासा देती हुई बोली
'वदोबस्त नही हुआ तो कोई हज नही | पूरा पका न सही, रच्चा-परका सकान बना ल्ेगे।'
वाली झुन्नलाई हुई जावाज़ में वाला चाची, मैंने पाहमुखाह फोठ पग्रिय दिया। मरी वो जबल मारी गई थी। तू ही मु्े मना कर देती ।
धरती धन मे अपना घट
जो हुआ सो हुमा । अप रब वा नाम छप्वर वाम घुरु वर द । जसा बन पड़ेगा बना लेंगे ।'
नही चाची, अव मैं गाँव मे नहा रहूँगा। तुम्हू भी साय हल जाऊंगा | मरा यहाँ वया रा है। मेरे यहाँ कौन से खेत बजर हो रहे हैं । वाली ने वहूत दुय भरे स्वर म कहा ।
'कारा इस बुलापे मे भरी वहाँ मिट्टी यराय बरेगा। मैंने सारो उम्र ह्स गाव म॑ गुज़ारी है बावी गा हैं वह भी यही वाटगी । तू चा जाएगा तो गाँव वाले मुझपर चार ल्कडियाँ डाल वर साड फू दंगे। यह बहती हुई चाची रोने लगी वाली भी रोहाँसा हो गया । वह बुछ समय तय चुप रहपर बाला
“चाची । तू ही बता अत मैं इस गाँव म किस मुह से रहेगा । सारे गाँव मं खबर धूम गई है कि पत्ता मत्रात बना रहा है। अब बच्चा कोठा ही पड़ा करूगा ता लोग क्हगे वि मर्ान गिराया तो इस तज़ी ते था जैसे इसवी जगह पर सोने की छका खडी वरेगा । जत्र फिर मिट्टी थे ढेंले पर ढेरा रघकुर दीवारें खडी कर रहा है । य॑ बातें नही सुनी जाएगी ।'
नानो हैरान और परेशान सी काली वी बातें सुनती हुईं उसे ध्यान सं देख रही थी । उसवी समझ मे नही आ रहा था कि वाली इस प्रकार को बाते कया कर रहा है। वह उत्तेजित स्वर म॑ बोली
इसमे शम की क्या बात हूं ? अपना मकान कोई जस जी चाहे बनाए। इन शब्दों में कोई जादू नहीं था। लक्नि नानो ने अपनी वात इतने विश्वास से कही कि काली हैरान सा उसकी आर दसने रूगा | भानो उस्ती लहजे म बोह़ी जंगर आदमी गाव व छोगो की भर्जी पर चलन छगे तो एक दिन म॑ ही या तो उसे गाँव छाडना पड़ेगा या वुए मे छछाग मारनी पडेगी । कली को इस सावली सलोनी सुडोल और स्वस्थ ल्डको के साथ अक्स्मात ही बहुत उयादा खिचाव का अनुभव हुआ। उसने अपनी कुदाल के फल जसी छम्बी लम्बी उगल्यिा और खुर्पे जत्ती चौडी हथलिया पर नज़र डाली । अपनी चौडी चकरी छाती का देखा और अपने मज़बूत बाजुआं को जवेडाया और मन ही मन सोचने लगा कि वह चाह तो घरती को एक प्िरे से पकड़ फर उलटा कर दे । बाली का चेहरा तमतमान गा और वह चाची को बाजुआ म उठाता हुआ बोला चादी, यही रहेगा और मत्रान भी पदता ही बनाऊँगा । मैं गढी व भटदे पर जाकर इटा के रिए कह आऊँ। फिर छप्पड से मिट्टी ढोने के लिए दीन परजापत (वुम्हार) के पास भी जानता है । सतासिह मिस्त्री से भी मिलना है।
ध्ड धरती घन न अपना
वाजी ने मुसक्राकर ज्ञातो वी ओर देया और उसकी झ्ुकी हुई आँखो को निहारता हुआ गली वी ओर बट गया।
५
दीन् वुम्हार वा घर गाँव के पश्चिस मं था । काली जब उसकी तलाश मं वहाँ पहुचा ता वह गोबर के ढेरा के पास वेरी के नीचे लेटा हुआ था और उसके दोना गधे ढेरा के पीछे घूम रह थे। काली की आवाज़ सुनकर दीनू उठ बढा और उसकी जोर ध्यान स देखता हुआ लज्जित स्वर म॑ बोला
आख लग गई थी ।!
अच्छा कोई हज नही । काली ने मुसकराते हुए कहा। दीनू अँगडाई लता हुआ उठा और अपनी मली सी पगडी उठाकर उसे सिर के गिद ल्पेटकर बोला
“सुना हैं तुम पक्का मज़ान बना रहे हो। बल तकिए मे कोई कह रहा था |
'इसीलिए तो तुम्हारे पास आया हूँ । पहले मेरे साथ गढी के' भटठटे पर चलो इट्टे दखनी हैं । उसके' वाद छप्पड से मिट्टी टानी है ।' वाली ने सब बातें एक ही साँस मे वह दी । दीनू ने बेरी की जडा के पास पड़े अपने टूटे और मिट्टी म॑ सने हुए जूत का पहना और काली के साथ हो लिया ।
भटठ क॑ निकट पहुचकर दीनू बोला "कौन सी इठें लेनी है---अव्वल, दोम, सोम या धघडा ?'
'पहुले देख तो छ फिर फसला करे (४ काली ने उत्तर दिया।
दीनू भथठे की दो बडी-बडो चिमनियो के पास जाकर मुशी को आवाज़ देने ढगा। मुशो का उत्तर पावर दीनू भटठे वी वगल म अन्दर जाने वाले रास्ते की ओर मुडता हुआ बोला
'मुशी भटडे थे अन्दर है । शायद बच्ची इटा वी छुनाई हो रही है।'
दीनू के पीछे पीछे बाली भी भटठे बे अदर चला गया | जहा आठ दस 888 करीने से कच्ची इटें चुन रह थे। दीनू को दखबर मुणी प्रसत भाव से
लग
धरतों धन न अपना ६५
'सुना परजापता, वहाँ रहा इतने दिन | तू तो वभी वभी एस गाोयय हा जाता है जस गधे ने तिर से सीय ।
सच मुशी जी ? विराके गधे व सिर रा सीग गायय हो गए ? दीनू ने हैरत से कहा भौर फिर दुय भरे स्वर मे बोला
'बडा जुल्म हुआ है । गधा बच गया या वह भी साय ही गायय हा गया ।' दीनू ने बहुत मासूमीयत से पूछा ।
मुशी की हंसी रोके नहीं रपती थी । वाली भी खिलसिलाक्र हस रहा था। कच्ची इटा वी छुनाई म लग हुए मजदूर भी पेट पपडकर हंस रह थे । भौर उह देखकर दीनू वे गाछा की झुरियाँ भी वनपटिया तक जा पहुची थी । मुशी ने बडी मुश्किल से अपनी हँसी को रोवा और दीनू की ओर देखता हुआ बोला
तू भी अवल या पूरा है। वभी गधे के सिर पर भी सीग ६ए है ।'
'मुशी जी तुमने अपने आप ही तो कहा है। पहले मुझे भी शक्र हुआ था लेकिन मैंने यहू सोचदर यकीन वर लिया क्यावि इस भरठे पर गाँव याव व॑ गधे भात हैं ।'
मुणी वी हँसी थम गई तो वह खाँस कर गछा साफ करके बोला
परजापत कस आए हो ?!
इसे इंठ खरीदनी हैं। दीनू ने कांछी को ओर सवेत करते हुए क्हा। मुशी ने काली को सिर से पाव तक देखा और उसकी वेष भूपा स उसको जात के बारे में किसी नतोजे पर न पहुचन्र असमजस मे पड़ गया । उसने काली को एक बार फिर ध्यान स देखा और दीनू को सम्बोधित करता हुआ बोला
कौन सी इट चाहिए ?!
दीनू वाली की ओर देखने लगा तो वह बोला
“अव्वल नम्बर ।
(कितनी चाहिए ?'
पदह वीस हजार तो छग ही जाएँगी काली ने कच्चा-पवका अनुमान गाते हुए कहा ।
मुशी उह अवंत नम्वर की इटा के ढेर के पास ले गया और एक इट हाथ म उठाता हुआ बारा
भवल से भी अवल नम्बर इट है। दस सालस भटठे पर काम कर रहा हैं एविन आज तक एसी इट नही परी थी। बिल्कुल लहू जसा रग है काली न भी एक इट उठाकर दखो ओर फिर ढेर पर रखता हुआ बोला
६६ धरती घन न अपना
'बया परजापत, मुशी जी ठीक कहत हैं ?
'परजापत से क्या पूछते हो | इटा वी पहचान इससे इसके गधा कौ ज्यादा है। उनपर अव्वक नम्बर वी इट लदी हो तो इतना तेज चलते हैं कि परजापत को भी पीछे छोड जाते हैं | दोम नम्बर हो तो रास्ते म॑ इधर उधर मारत हुए जाते हैं। अगर सोम नम्बर वी इट लदी हो तो उनकी आपस मे टागें टकराने लगती हैं। क्या परजापता ठीक' है ना ?' मुशी ने हँसते हुए
पूछा। हे बाली इटें देखने के लिए थोडी दूरी पर वने ढेरो वी ओर बढ गया तो मुशी दीनू से बारा
'परजापत । कौन आदमी है यह
'बया तू नही जानता इसे ?” दीनू ने आश्चय से कहा और फिर ऊेचे स्वर मे बोला
न्मारों का वालो है। इसके बाप का भला-सा नाम है--भछा-सा नाम है-- यह सोचत सोचत दीनू न अपनी पगडी और भी ज्यादा टेढी कर ली और मुह म बुट्वुदाने लगा
“भरा सा नाम है उसका । और फिर मुशी वी ओर देखता हुआा बोला
'यह शहर म रहता था | थांडे ही दिन पहले गाव वापस आया है । अच्छे पस क्माकर लाया है
'में भी सोच रहा था कि शक्ल से चमार दिखाई देता है लेक्नि पहनावा कुछ और वहता है ।” मुशी ने कहा ।
जब काली उनके पास आया तो वे चुप हो गए। मुशी दा रहजा पहले से
कुछ बदल गया था| वह अव” नम्बर वी इटा के चक्र पर हाथ रखता हुआ बोला
फिर कौन सी इटें पसद की हैं ?”
मुझे तो पहचान नही है। मिस्तरी सतासिह न वहा था कि अव्वल नम्बर वी इट बढिया होती है ॥!
ता अवल नम्बर ले लो ।' मुशी ने कहा ।
क्या दाम है इसका २?!
यह बायह रुपये हो रहएर है ५ सुशी न उत्तर दिया ।
जा मुनासिव हा वह दाम रूगा ल ।
'मुशी जी, काली चौधरी नही है। दाम भ कुछ रियायत कर दा ।' दीनू न वहा।
धरती घन न अपना इ्छ
'सुना परजापता, वहाँ रहा इतने टिन | तू तो व्भी वभी एस जाता है जसे गधे वे' सिर से सांग ४
सच मुशों जी ? किसके गधे वे सिर से सीग गरायत्र हो गए हैरत से कहा और फिर दुप भरे स्वर म बाला
(बडा जुल्म हुआ है । गधा बच गया या वह भी साथ ही गायय दीनू ने बहुत मासूमीयत से पूछा
मुशी की हँसी रोक नही सकती थी । वाली भी स्रित्प्िलावर था | कच्ची इटा की छुनाई म लूग हुए मशदूर भी पेट परडकर हेंस और उदहे देखबर दीनू वे गाला की सुरियाँ भी वनपटिया तक जा पा मुशी ने बडी मुश्किल से अपनी हेंसी को रोका और दीनू वी ओर € बोला
तू भी अवल का पूरा है। कभी गधे पे सिर पर भी सीग ६ए है ।
मुशी जा तुमने अपने आप ही तो कहा है। पहले मुस्से भो शत ? लेबिन मैंने यहु सोचकर यकीन क्र लिया वयाकि इस भटठे पर गाव गाँर आते है ।'
मुशी वी हसी थम गई तो वह खास कर गला साफ करके बोला
परजापत कस आए हां ?!
इसे इटें खरीदनी है। दीनू ने काली की ओर सकेत करते हुए कर सूुशी न काली को सिर से पाव तक देखा और उसको बवेष भूपा स उसकी जा क॑ बारे में कसी नतीजे पर ने पहुचकर असमजस म॑ पड गया । उसने वाला को एक बार फिर ध्यान से देखा और दीपू को सम्बोधित करता हुआ बोला
कौन सी इद चाहिए ?!
दीनू वाली वी ओर देखने रूगा तो वह बोला
आवल तम्बर।
'क्तिनी चाहिए ?
'पादह-चीस हजार ती रग ही जाएँगी काली ने कच्चा-पत्रा अनुमान लगाते हुए कहा ।
मुशी उह अवल नम्वर बी इटा के दर के पास ?े गया और एक इट हाथ में उठाता हुआ वाला
अवल से भी अवल नम्बर इट है। दस सात से भटठे पर काम कर रहा हूँ लेकिन आज तर एसी इट नहीं पी थी । बिलकुल हू जसा रग है । घाली न भी एक इट उठावर दखा और फ्रि ढर पर रखता हुआ बोला
६६ धरती घन न अपना
'वया परजापत, मुशी जी ठीक बहते हैं ?
'प्रजापत से कया पूछत हो । इटा वी पहचान इससे इसके गधा को ज्याता है। उनपर अवल नम्बर की ईंट ढदी हो तो इतना तेज चलते हैं वि प्रजापत को भी पीछे छोड जाते हैं। दोम नम्वर हो तो रास्ते में इधर-उधर मारत हुए जात॑ हैं। अगर सोम नम्बर वी इट लदी हो त्तो उनकी आपस में टागें टकराने लगती हैं। क्या परजापता ठीक है ना ?” मुशो ने हँसते हुए पूछा ।
काली इटें देखने के लिए थोडो दूरी पर बने ढेरा वी ओर बढ गया तो मुशी दीनू स बोर
“व्रजापत । कौन आदमी है यह
क्या तू नहीं जानता इसे ?” दीनू ने आश्चय से कहा और फिर ऊेचे स्वर मे बाला
श्वमारा का वाली है। इसके वाप का भल्ता-सा नाम है--भला-सा नाम है--' यह सोचते सोचत दीनू ने अपनी पगडी और भी ज़्यादा टेढी कर छी और मुह म बुदबुदाने लगा
भटा सा नाम है उसका । और फिर मुशी वी ओर देखता हुआ वोछा
“यह शहर म रहता था । थोडे ही दिन पहले गाँव वापस आया है । अच्छे
पस्त क्माकर लागा है ।' मैं भी सोच रहा था कि शक्ल से चमार दिखाई देता है लेकिन पहनावा बुछ और बहता है । मुंशी ने बहा ।
जव काली उनके पास आया तो वे छुप हो गए । मुशी का रहजा पहले स
जा बदल गया था। वह अ वल नम्बर वी इटा के चत्र पर हाथ रखता हुआ ||
फिर फोन सी इरटें पसद वी हैं ?
'मुय्े तो पहचान नहीं है। मिस्तरी सताप्तिह ने कहा था कि अब्वर नम्बर वी इंट बढ़िया होती है।'
'तो अव्वल नम्बर छे छो। मुशी न कहा ।
'क्या दाम है इसका २
यह बारह रुपय वी हजार है ।' मुशा न उत्तर दिया |
जा मुनाप्तिय हा वह दाम लगा छें ।
'मुग्ी जी, वाली चौधरी नही है। दाम मे वुछठ
छ रियायत ! का बर दा। दीनू धरती घन मे अपना ६७
'हुमारे लिए सब चौधरी है | परजापता, चौधरमा पते से हाता है। जिसवे वास चादर है वह चौधरी है ।' मुशी इधर उधर की बातें व्रत एगा तो दीनू वाली स बाला जितनी इट लेनी है उसवा पर्वा बनवा ऊो। काली ने मुशी से पाच हजार इदा वा पर्चा वाटन वे लिए वहा परन्तु घह चुपचाप खडा अविश्वास भरी नज्रा से वाली वी आर दखन रगा। दीनू ने भी मुशी स पर्चा वाटन वे लिए वहा तो वह अविश्वास भरी नजरा से देखता हुआ बोला “याने के लिए पसे लाए हो २! नहीं, इस सप्॒रय ता मरी जेब म एवं दा रुपथ हागे । बाली ने बहा | साठ रपये की इट हागी दो ढाई रुपय रदाई और ढाई के हांगे । इतनी रकम के लिए दा स्पय वा ब्याना कुछ टैसियत रखता है। सुशी ने वहा । वाली तो चुप हो गया लेक्नि दीनू मुशी से बोला पस आ जाएँगे । तुम पर्चा काठ हो । 'प्रजापता, अगर पसे न आए तो मैं तुम्हारे दोना गध्चा समंत तुम्हे यहाँ बाध छूगा। मुशी ने कहा | यह भुनकर काली को क्रोध जा गया । वह तीखे स्वर म॑ बोला “परणजापता, चलो यहाँ से, जब पस देवर ही ग्गल खरीतना है तो जहाँ से भी चाहें खरीद लेगे। अभी हम ने एक इट तक ली नही है मुशी जी ने पहुले ही से हम बेईमान समय लिया है। काली वी बात सुनकर मुशो कुछ शरमि ”ॉ-सा हो गया लक्नि फिर हौसला करता हुआ बोला इसम गुस्से की कोई बात नही । हम उधार कम ही दत है । अगर दना ही पड जाय तो पहले आसामी देख छेते हैं । अगर कोई चौधरी उधार माँगेगा तो देने म॑ ज्यादा हज नही है क्यावि हर शशमाही फ्सलू वे! मौक पर वसूछी वर ल्गे। ऐसे लोगा स देर सवेर से पसे मिल ही जाते हैं लकिन बेहैतियत जादमी से पता निकालना बहुत मुश्किल होता है। बावक का भगलू चमार घार हजार इट छे गया था। तीन साल हो गए है अभी तव सिफ बाईस रुपये वसूल हुए हैं। अय उसस भटढ़े पर लिहाडियाँ हग्रवाकर पसे पूरे कर रहा हैं। एक दिन आता है ठो दो दिन गायव रहता है। वही साए-्सवा साल भ पस पूरे होंगे। मुशी वी थात सुनवर काली वी गदन झुक गई । मुशी अपनी सफाई पश
द्ट्द धरती घन न अपना
करता हुआ वाला मैं नजूमी ता हू नही कि आदमी वा चेहरा दखतर उसका मदर जान छू । नया आदमी आए ता पूछना ही पडता है मैं पचा काट देता हूँ आज शाम वा या कल सवेरे पसे दे जाना ।! “नहीं मैं एक ही वार पूरे पँस दवर ईंट उठाऊँगा । वाली दीनू को साथ लेकर अपने गाव वी ओर चल पडा | जव वे भट्ठे से थाडी दूर बा गए ता वारी बाटा 'प्रजापता मुशी णक्ती आदमी ह नहीं मृुशी आदमी दुरा नहीं है । अगर आसामिरयाँ पस न दें तो आदमी शक्त्री हो ही जाता हू। लोग तो एक जूत से दो चार सार निशाट छेत हैं लेक्नि मुशी साल म दा जूते तोडता है] दीनू ने वहा । दीनू मुशी वी प्रशसा और उसकी मजबूरिया वा वणन वरके वाटी को यह विश्वास दिलाने वी कोशिश वरता रहा कि वह अच्टा बादमी है। सपर सुदन दे बावजूद वाली यही अनुभव कर रहा था दि मृभा से उसका अपमान क्या है। उसके मन मे तरह-तरह के विचार आ रह थे लेविन वह चुप था । जब व गाव के निरेट पहुँच गए तो वाली बपत मुहल्ल को जान वाली गली के सामने रक गया और दीनू से बाला परजापतजी, मैं मिट्टी खोटने छप्पड पर जा रहा हू । तुम दोनो गधे लेकर जल्दी वहाँ पहुच जाना। दोपहर स पहले-पहढ़ दो-तीन फेरे ल्गाल तो बच्टा है । दि रर 2 वाली जब छप्पड पर पहुचा ता घूप बहुत तज्ञ हां गई थी। उसने बिकनी मिट्टी का एक टुकड़ा चुना और पूरे गौर से मिट्टी खादन छुगा | झमझ झगेर से पसीने की नरटियाँ फूट रही थी। योटे ही समय म उसने मिट्री छाल्कर >+ एगा दिया । दीनू अपने गधो के साथ छप्पड के बहुत निकट आा गया वा ब्प्ती तु >> फेंक दिया और उमे आवाज देता हआ बोला ;; 'परजापत जी आ गए हो । दीनू ने गधा का मिट्टी के ढेर के' पास खडा कर ल्वि आर दोनों दिल्कर बोरा म मिट्टी भरन छगे। बोरे भर गए दो दानों न 6>++ मे राधा पट
लाट दिया । दीनू उट्ें गाँव को आर हॉक्न लगा ठा शर्त बटाज उस्लो टेक बोरा 0000०
घरतो घन न अपना
'प्रजापत जी, मिट्टी आगन गा एक बोन मे पेंफया और जलता यापस जी
जाता ।!
पाएी अभी दीनू प। समझा ही रहा था वि छप्प” य रिलाने पर दिसी
के तावडतोड़ गालियाँ देने पी आवाज सुनाई देने लगी । पारी और दीनू हैरात होपरर उस ओर देखने छगे । मगू चौधरी गी थोड़ी गो सुटी छोडार उस ओर भागा भा रहा था। उसो छप्पढ मे छलाँग मारत हुए गाली दार पूछा नि बौन मिट्टी घाट रहा है हार्टांबि उस मालूम था कि बाली प्रिट्टी खा” रहा है | मगू ने इनके पास पहुँचरर बहुत रोर स पूछा
"विससे पुछतर मिट्टी खो” रहे हो ?” मगू वा बात बरन या ठग एसा था जसे यहे छप्पड का मल्वि' हो । मगू न आग बढ़यर झुटाल उठाता घाहा एवित वाली ने उस पर अपना पाँव रख दिया । मगू गाछी हबर बाटा
'मैं पूछता हूँ वि विससे पुछकर मिट्टी खोद रहे हा ?
'छप्पड से आज तय जिसी ने पूछरर मिद्टों खादी है जो मैं भी पूछते जाता भौर विससे पूछता ?
'यहू छप्पड तेरे बाप की मल्वियत नही है छुत्ते वा पुत्तर आगे उटी जवाब देता है ।
'छप्पड का पट्टा तेरे बाप के नाम भी नहीं है। वाली ने षुद्ध स्वर मे पहा । वह सोचने छगा कि चौधरी उसे इसलिए नीच समझता है क्योवि बहू चमार है--छज्जू शाह उसे दिसी गिनती म शुमार मही करता कि वह गरीब है । मूशी उसपर इसलिए विश्वास नही करता क््यांकि वह ज़मीन वा मालिक नही है, छेवित मगू किस विरत पर इतना रोब दिखाता है। वाली मगू को समाझाता हुआ बोला ।
तेरी रगा म॑ खून वी बजाय पानी बह रहा है जो तू इस तरह वी वातें क्र रहा है |
काली पहले ही धूप स सताया हुआ था और मगू का गालीगलोच सुनतर उसका सारा शरीर पोध से जलने लगा । मग् गधो पर लदे हुए बोरे फेंकने लगा तो काली ने आगे बढ़कर उसका हाथ पक्ड लिया। दीनू ने जब यह देखा कि दोना म हाथापाई तक नौव॑त पहुच रही है तो वह वहाँ से दौड पडा और छप्पड के विनारे पर वृक्ष वे नीचे जा खडा हुआ । भगू अपना हाथ छुडने की कोशिश करता हुआ गाल्यथिँ वक्ता रहा | वह इसम अस्तफल रहा तो उसने अपना सिर काली वी छाती पर मारा। काली ने उसकी कलाई मरोडकर बाजू पीद के पीछे लगा दिया । मगू का सारा शरीर ऐंठन ऋछगा।
३० धरती धन भ॑ भपना
इन्सान वी जौलाद हू ता आगे झिसी पर हाथ न उठाना ! वाली ने मगू की वबलाइ मरोडते हुए कहा । भगू गालियाँ देता हुआ काटी वी ओर चपटा और उसवी छाती पर दो- हत्यड मारत लगा । ठहर जा / काली ने दात पीसत हुए कहा और मगू को गदन से पक्ड कर नीचे गिरा दिया। वहू अपना एक पाँव उसकी बलाई और दुसरा उसवी छाती पर रखता हुआ वोला अगर जरा-सा ज़ोर दे दू तो तेरी हश्डिया गम भटठी म भुत रह चनो वी तरह तडाख-तडाख करने लगेगी । जब छाती पर दवाव के कारण मग्रू वी सास स्वने लगी और उप्तकी अण्खें बाहर निकल आई तो काली न अपने पाव उठाते हुए कहा वस इसी ताकत पर इतना अक्ड़ता है मगू कपडे साडता हुआ उठा जौर बहुत कुद्ध स्वर मे वाला अमर तुम्ह वँद न कराया तो मेरा नाम भी मगू नही है । जाता है यहा से कि नहीं। बडा आया थानदार का साला जा, जाकर चौधरी के तल्वे सहला । उसके पाव में भी खारिश हो रही हांगी ।' काली का अपनी ओर बढता देखकर मगू गालिया वक्ता हुआ छप्पड से बाहर चछा गया । जब वह काफी दूर निबल गया ता दीनू काली के पास आकर भयभीत स्वर में बोला बाली दास, बुरा हुआ मगू बडा नामुराद आदमी है। अब यह चौधरी को तुम्हारे खिलाफ भडकाएगा । काली उसकी बात का कोई उत्तर दिए बिना बोला परजापता, मिट्टी फेककर जलती जा जाना। और देख इस झ्गडे के बारे मे कसी से बात न करना । मेँ क्या करूँगा । मैं गरीव आदमी हुँ--मुझमे तो सार खाने वी हिम्मत नहीं है । दीनू ने कानों को छत्त हुए वहा १ दोनू वे जाते के बाद काठी कुछ सभ्य तक यू ही खडा इधर उधर दखता रहा ओर उसने फिर इत्मीनाम का साँस शिया और साचन लगा कि और कुछ न सही आज उस मगू को ताकत का पता चल गया। साथ ही उसके दिल म खोफ वी एक परछाई ल्ट्टररा गई कि अगर मगू ने चौधरी स कह दिया तो बात बढ जाएगी | उतने इस भय को घटदते हुए साचा दि समय आने पर वह चौधरी स भी निपट छेगा। डर डरकर दिन गुज्ञारने से मर जाना ही
धरती धन न अपना ७१
अच्छा है!
दीनू वापस आया ता वाली य' मन रो मगू 4 साथ झंगइ़ रा पहा होने वालो बचती बरटश भौर प्रोधष दूर हो चुनें थ | उसी बारे भरपर दाता गधा पर छद॒वा टिए और बुदार उठाता हुआ बोटा
परणापत जी, धूप बहुत तथ् हा गई है। अर हित ढेट ही काम छुझ बरेंगे ।' वे गधा मे पीछे चलने छगे। दातू काटी के बहुत निगट होगर बोला
जब मैं इधर वापस आ रहा था ता मगू चौधरी वी हथेली मे बाहर खडा था ।
००
दोपहर वे' समय तव्िए मे हुर आदमी चमादडी वो ओोर उत्सुकता स देय रहा था। ताश और चौपड बद पडी थी । गपशप भी ठठी थी। लेविन जब उहें चो मे काली नज़र आया तो वहा एकदम हलचल सी सच गई। लेटे हुए लोग उचव' कर बठ गए। बढे हुए लछोग उठकर खड़े हो गए | वाली तविए म दाखिल हुआ तो एक साथ वई आवाजें आइ काली इधर ना जा | यहा बहुत घनो छाव है । जीतू दौडक्र पाली के साथ लिपिट गया और उसे उठाकर अपनी पाट पर बिठां दिया ॥ वह हापता हुआ बाला वाबू जी जाज तूने मेरे मन को मुराद पूरी वी है। साले यो ऐसा मारा कि उम्र भर याद रखेगा। वडा फ्न््नेखा बना फिरता था । काली हैरानी से जीतू की ओर देखते लग कि यहाँ केसे खदर पहुच गई। वह चक्ति-सा बोला "किस वी वात कर रहे हो ?! उसी रानीखा के साले की जो चमादेठती का चौधरी बना फिरता है।' बाउ ने वहा । मैंने तो कसी को नहा मारा ।' कारी ने भावहीन स्वर से वहा । सब
छए् धरती धन मे अपना
खिलखिला कर हेसने ढगे जेसे काली वी खिलली उडा रहे हा । सत्र लोग उस वे गिद इक्ट्ठ हो गए तो काली ने चारो झोर नज़र दौडाई बड़ के नीचे एक आर दीनू अपनी पगडी बिछा कर ठेटा हुआ था। वाली ने उसे आवाज दी ता रेतली जमीत वे साथ यू चिपट गया जेसे गहरी तिद्रा म॑ हो | काली ने उसे वरावर पुकारा ता वह आख मेसठता हुआ उठा और उसके पास आकर सहमी हुई आवाज़ मे बोज़ा मैंने कसी को नही यताया कि तूने मगू को मारा है। जिस बी जी चाह सोगध दे दो । परजापता डरता वया है ? तूने कसी की चुगली नही खाई, निदा नही की ।' जीतू न दीनू का हौसला देते हुए कहा । दीनू कुंम्हार, काली के तगड़े शरीर को देखकर और भा सहम गया और फिर जीतू दी ओर इशारा करता हुआ बोला कं तो बुछ भी नही बता रहा था ! यही वुरेद-कुरेदकर पूछ रहा था ।” दीनू की बात पर सन हसने लग । जीतू काछी का दाज से पकडता हुआ बाला बाबू जी, यह बताओ लठाई हुरू कस हुई थी ? “'मंगू को तो किसी भी बात से लडाई शुरू हो सकती है । बतू न उत्तर दिया | यारो चुप रहो काली की जबान से पूरी कहानी सुनेग । सत् न हाथ से सब को खामाश रहते का इशारा क्या । काली चुप रहातो वतू रोने की बनावटी आवाज निवाल्ता हुआ बोला निक्क मगू को भार पडी है। जाकर उसे उठा ला। शायद अभी तक 'उप्पड्ड मे ही पडा होगा।' लिक्कू का चुप देखकर वलू उसे कुछ और कहने ही वारा था कि जीतू ने उसे रोक दिया । झहूर थार बाबू जी से पूरी वात तो सुन लेने दा। वायु जी बताओ ना लड़ाई कसे शुरू हुई थी । कोई खास लडाई नही हुई !! कालो ने ये श€ इतती गम्भीरता स कहे वि' सब चुप हा गए । काली को इस वात पर हैरानी थी कि अब जीतू बतू सतू इत्यादि रेर बने हुए हैं परतु जब मगू यहा होता है तो सब यू चुप बढ जात है जम इह साप संघ गया हो । रा
धरती धन न अपना
बुछ समय के रिए सब यामाश हो गए । वाली वे गम्भीर स्वर ने उनकी खुशी को वाफूर कर टिया था। वारी वा उनके मुरताए हुए चेहरे देयपर हंसी आ गई और वह जीतू वी रान पर हाय मारता हुआ बाला आज तरे पहुष्वान की मैंने सप घरमस्तियाँ चाड दी हैं ।' वह मगू व साथ अपन झगडे वी कहानी सुनाने 2गा तो संत व उेटर एक बार फिर दमन ल्गे। काली ने उह वताया वि उसने मगू को चित्त गिरावर उसयी छाती पर पाँव रखकर कहा कि जगर वह आदमी शी औलाल है तो आज व' बाट विसो पर हाथ नही उठाएगा। वाली अगर सगड्ट वी कोई कडी भूछ जाता तो दीनू उसे बीच म॑ जोड देता । बातानवाता मे हिन ढलछ गया तो राग घडी भर आराम वरन बे लिए हट गए । काली भी तद्बा वी हालत म था जब दासू चौवीटार ने रूठे हुए बच्चे वी तरह सय् से अलग पड़े निउकू से पूछा बाली है यहाँ ? काली ने अपना ताम सुना तो चौंक कर आँखें खोल दी । क्या क्या बात है ? निरकू खाट स उठता हुआ बोला । चौधरी जी ने उस दीवानखाने बुलाया है। वह सामने क््यूतर वी तरह आँखें वद किए हुए पडा है। जारर उठा ले। निवत ने बाठी वी खाट वी ओर सवेत करत हुए कहा | दासू को देखकर सव लोग उठ बठे और आँख्ा ही भँखो मे इशारे करत हुए एक दूसरे से धूछने लग कि वह क्या कह रहा है । काली खार स॑ उठता हुआ बाला दासू क्या वात है ? चौधरी न तुम्ह दीवानखाने बुलाया है। दासू पं शद सुनकर दीनू कुम्हार का खून खुप्क हो गया और चह सरकता सरवता सरक्डो के पीछे चला गया ताकि दासू वी नज़रा से ओझल हा जाय | काली ने दीनू वी तलाश म चारा ओर देखा जौर उस कहो न पाकर मुसक्राता हुआ ऊँची आवाज़ म बोला परजापता गधे लेरर छप्पड पर पहुच जाना मैं चौधरी जी की हवेली से सोीघा वही आ जाऊंगा ।' काली को चौधरी गी हवेली से बुलवा आने पर सव सहम गए ।नीतू मे हासू को एवं जोर छे जाबवर धीमी आवाज़ म पूछा चौधरी ने कारी का क्या बुलाया है ?
४ धरती घन न अपना
पहले तो दामू छुप रहः लेकिन जीतू वे थार-वार पूछने पर वह इधर उधर देखकर गोपनीय स्वर म बोला आज मैं सबरे से ही दीद'नखात मे था| एसा लगता है वि काली न भगू यी अच्छी मुरम्मत वी हू । साले को जान से मार देता तो अच्छा था। सारी दोपहरी चौधरी वे तल्वे सहलाता हुआ विलाप करता रहा है। एक-दो बार ता दहाड मार बर रोया भी । यह तो मुझे पता नही उसने चोधरी से क्या कहा हु लक्नि वह था गुस्स में । जीत ने आँखा ही-आखा म बातू का सारी बात समझा दी | काली भी ताड गया कि उसे मंगू क साथ यगडे वे! सिलसिले म ही बुछाया गया है | वह दीनू को छप्पड पर भेजन के शिए जीतू वी तकीद करके दासू के साथ चल्ल दिया | जब वाली और दासू कुछ दृर तिकल गए तो निजकू जीतू ओर वलू वा मृह चिहाता हुआ बोला क्या ?क्या माँ मर गई है जा इस तरह चुप बठ ही ?' फिर वह अपनी छाती थपथपाता हुआ वाला मंगू वा छेलना बेल के सांगा पर चढ़ने व वरावर है। जब खर मनाओ कि वालो थाने स इधर टी बच कर आ जाए | जीतू और वतू चुप रह तो निक्यू उनके मुह वी आर अपना चप्पा बताता हथा कटने लगा अय यहा क्या बठा है ? जा जारर अपन बाय का छूड्ा छा ? निककू की बातें सुनकर जीतू खोतप गया और उसको जार झक्ता हुआ चोला मगू कोई रव नही है । तरी मेरी तरह चमार है। तू धौंत ता एस द रहा है जस मयू इलाव॑ का यानेटार लगा हुआ है । मर के सामने वहो तो वात भी है। पीठ पीद्ध तो लग सरफ्ार का भी गाली दे लेत है। निक्क् न जीतू को हल्फारा। जीतू और 'निक््कू मं वात बढ़ने छग़ो तो वाकी छ्ोंग उनमे वीच-वचाव क्रान ल््ग। लोग जभी तृतु मैं मैं म लग हुए थे कि कारी तकिए म॑ वापस आ गया ! उसने फटतार कपड़े की क्मीज और खाकी निवरर पहन रखी थी।पाव मे पंशावरी चप्पल था आंर धूप स बचने के लिए सिर पर याढ़े के साफे की जगह तोल्या रखा हुआ था । उसकी वष भूपा दखकर सव क भुह हरत से खुले रह गए। जीतू काली के क्पडा को प्रशसा भरी इृष्टि से दखता हुआ प्रसनभाव
धरता धन न अपना ७५
संबोला
मेरा बाद जी जाज ता सचमुच का बाबू जग रहा है ।
निवत् थिलखिल्कर हँस पडा ।
“रही सही कसर चौधरी पूरी कर देगा । वह थाड़े दिन पहले ही विलायती जूना लाया है।
वाली ने निक्कू की जोर काई ध्यान न दिया और जीतू के विंक्ठ जाकर बोला
परजापत के साय छप्पड मे जारर गधा पर बोरे रूदवा दना । मिट्टी मैं सवेरे है खोद आया था। मैं भी वहा जल्दी से जल्दी पहुचतने की कोशिश क्ख्गा।
काली चौधरी थी हवंटी वी ओर जान वाल बदे रास्त थी ओर बढ़ गया । सब आँखें उस पर लगी हुई थी । ताया वसता उसवी ओर ध्यान से देखता हुला बोला
काली वा रग चिट्टा हाता तो इन कपड़ा मे यह भी गोरा साहब िणाई देना ।
अगर साहय नहीं है तो चोधरी बना देगा । पिउछे लिना जींतू को ता चौधरी ने साहब बना दिया था। निकक्कू ने जीतु वी ओर देखत हुए कहा | जौर अपनी घाट उठारर चमादडी थी जोर चला गया ।
निककः गला मे प्रवेश करत ही अपनी पत्नी प्रीतों को जावाज़ें देन जगा। प्रीती कोठडी में सा रही थी। निकदू ने उसे झझ्ाल्पर उठाया और एक ही सास मे पूरी बात बता ही। प्रीतो सिर पर दुपद्रा लता भी भूठ गई और मगू की माँ जस्सा 4 घर होसर बाठी वी चाची प्रतापी व पारा आ गई
थाटी हो हर म मुटह> मे हाहात्रार मच गई। चाची प्रतापी और जस्सा एक्-द्सरी वा गारियाँ देती हुई स्थापा कर रहा था और ज्ञानो हैरान-सी साथ रही थी पि होना वे मूठ कसा बट वर ३
११
वी समरह वी थाटा छाट से महान मे स्पर्र चौधरा वो हयाटा वी ओर दखन एगा।उम मह्गूग हुआ गि सक्ट या मान जिसमे बच्य आधा
७६ घरतों धन ने खझपना
छुट्टी वे समय सेल्त हैं, पहले से राफी छोटा हो गया है और हवेली वी दीवार स्कूल के बहुत नजदीक पहुच गई है। बाली मदान से बड वे दो बडे वृक्षा वी ओर चछा गया जहा दोपहर वे समय चौधरी हरनाम सिंह और मुहल्ल क दूसरे चौधरी आराम करत है। लेक्नि वहा किसी का न पावर वह हवेली वे फाटव वे सामते आ गया । फाटव चर लगी हुई जिस्ती चादरा वा रग बाला पड गया था यह फाटक चौधरी हरनाम सिंह के ताऊ बसावा सिंह ने उ दिना बतवाया था जब उसे जटटारी मिली थी । हवेली कै अदर दीवानखाता भी जल्दारी के दिन' म ही बनाया गया था । वाली ने फाठक को धीरे से योल्वर आदर झावा और फिर भाग बढकर चद कर दिया | फाठक के खुठन और बद होने पर चरा चरा वी आवाज आइ तो एक कत्ता जोर से भौका । साथ ही दालान से टैगर टगर टगर की आवाज़ आई । लेकिन वुत्ता भौंकता हुआ काली वी मोर दौट भाया। काली पत्थर का एक टुक्डा उठाकर उस डराने धमदाने लगा। दाल्गान से दासू दौडा और कुत्ते को पटटे स पकड कर दालान वी ओर ल गया जौर वाली को दीवानखाने को और जाने वा सकेत दिया । काली दीवनखान बी आर जाता हुना हवछी म चारा ओर देखने लगा। चाइ ओर दालान भ॑ दो भर्से और एक धोडी बेंघी थी । उसके साथ ही एक और टालान में बला के लिए लम्बी पक्वी खोर बनी हुई थो। उसी दालान म दूसरी ओर दो पहिया वाली बल्गाडी खडी थी और वाहर गडडा खडा था। दोना दालाना के सिरा पर एक एक कोठडी थी | दूसरी कोठडी से दीचान खान तक एक छाटी सी दीवार थो जिसके पीछे चौधरी का तीन मणजिला रिहायशी मकान था । दीवानखाने का पिछला हिस्सा भी रिहायशी मकान से पिला हुआ था । काली तीन सीढ़ियाँ चटकर दीवानखाने के चबूतरे पर आ गया और फिर चरामद म॑ स्वक्र बारी-वारी तीन दरवाजो वी आर देखने लगा जिन पर वारीक सरक्डा की चिक लटक रही थी। वह इस असमजस मे था कि कौन सी चिक उठाकर अदर जाये कि एक चिक के पीछे से चौध सी हरनामसिह का
भतीजा हरदव बाहर निकला | काछी ने उसे एकदम पहचान ल्यिए और बदगी करता हुआ मुत्कराकर बोला
चौधरी हर्ूव, पहचाना नहीं ? मैं बाली हूँ 7 हरदेव कुछ क्षणा के लिए चक्ति सा उस पहचानने की काशिश करता रहा
घरती घन न अपना छछ
ओऔर फिर उरार जोहन में छ गाट पहले को ममझोर छैतित मजयूत्र हृह्टी पा लड़ना उमर आया । बह वाली थी आर टैरत और प्रणमा भरी पशरा से देखता हुआ प्रसानभाव स बोला
सुनाओ वाली--धब वापस थाया तु ? फिर उस तगड़ें शरीर को देखवार अपन बाजुआ वी सछलिया और पट्टा को दोगा हाथा से हवाता हुआ वहन लगा
जिसमे अच्छा वमावर आए हो ।
वाली उत्तर म मुसवरा टिया | हरदेव अपन सारे शरीर या झटकता हुआ वाला
सवेरे आवरर भरी माटिश वर जाया बरो । इस गाँव से एवं भा श्सा चमार या कमीन नही है जो अच्छी तरह माटिश वर से | मंगू स नभी- कभी माश्णि बराता हूँ एक्नि उसने हाथा मे जान ही नहीं है ।
काली उत्तर म मुसत्र राता हुआ वाहा
बडे चौधरी साहयर वहाँ हैं ?
हरतव ने एक चिव्र वी ओर इशारा किया और उसे आने की तागीट” वरता हुआ वाहर निकल गया ।
काली चिक उठावर आदर चला गया और दरवाणे वे पास ही रुएझ गया । चौधरी हरनाम सिंह सूती चारपाई पर छेटा हुआ था | भगू दरवाज़े स ज़रा हटकर छत से लटक रहे झालरदार पल्ले को धोरे धोरे खीथ रहा था ॥ वाली थी आहट पाकर चौधरी ने आँखें खोल दा औौर उस्ते बढ़ने वे लिए इशारा करके करवट बटल ली। वहाँ बठने लिए मुछे नहीं था। काली ने ज़मीन पर बहने की बजाय खड़े रहता ही मुगरसिय समसा। वह मगू वी ओर देखने छगा जो नगी जभीन पर पाव पसारे वढठा पस्ते की रस्सी खीच रहा था|
जब चौधरी न दां चार वार करवट बदली तो मगू पा छोडकर रिहा- यशी मरान थी जोर खुलने पाले दरवाज़े म खडा होकर आवाजें नेने रूगा
ओ नत्यथ. चौधरी जी वे लिए वाटामा वी ठडाइ ले आओ । बह इधर- उधर घूमता हुआ यू आवाजें दे रहा था जसे इस घर क इन्तज़ाम म उसे खास दखल हासिल हा । जय उसे कुछ न सूचता तो दीवानखाने क॑ चबूतरे पर खड़ा होवबर कुत्ता कं नाण पुलास्द ऊूणत्ता
थाड्ी दर व वाद चौधरी हरनाम सिंह उठ बठा । पिर पर साफा रखा और खाट पर पाँव लटका कर बढ गया । काली को खडा देखरर उस मांथ
छ८ घरतो धन न अपना
. ॉनि्नियंस.
पर त्यूडिया चढ आइ | बोई और चमार होता तो उसे वह तुरत्त ही दा चार गाल्या सुना देता लेकिन काली का डील-डौल और वेप भूषा देखकर वह अप रहा | बादामों वी ठडाई पीकर वह कारों से बोला
तुम पर बोइ नई जवानी नही आई है जो राह जात लोगो से छडाई माल लता है । ऐसी अद्यी जवानी जलती ही सकी यूह-खदक म॑ जा गिरती हैँ ।'
काली चौधरो वी बात को पूरी तरह समय न सका और धीमे स्वर मे बोला
चौधरी जी, मैं आपकी वात समझा नही | मैं तो किसी ने साथ झगड़ा नही करता ।
'आज तूने मतू को मारा । अगर उसकी कोई हड्डीससली दूट जाती तो कौन ज़िम्मेदार होता ?
'चौधरी जी पहल मैंने नही की थी | मैं छप्पड म मिट्टी खोद रहा था तो मगू ने पहले मुझे गाल्या दी फिर उसने गधा पर ल्द॑ हुए मिट्टी वे' बोरे नीचे गिरा दिए । दाद म॑ उसने मुझ पर हाथ उठाया ता सुसते भी जवाब देता पडा ।
'तूने कुछ कहा हागा तो उसने हाथ उठाया । तरा झगड़ा मगु से हुआ लेकिन तून कुदाल घोडी को मारी। अगर उसकी टाम पर लग जाती तो मेरा पाच सौ रुपया का जानवर नाकारा हा जाता । वह डर कर ऐसी भागी क्रि उसे दो आदमी नगल के पास से पक्ड क्र लाए हैं ।
चौधरी ने उत्तेजित स्वर म कहा ।
'मैंने तो घोडी देखी तक नही कुदाल कस मारता ? यह बिलकुल झूठ है। आप मगू को मेरे सामने वुझावर पृछ लें। काली उत्तेजना म॑ चौधरी वी चारपाई वी ओर एक कदम बढ जाया । चोधरी सरहात से टेकः लूगाता हुआ बोला
गाँव मे रहना है ता भल्मानती से रहो । जिस थाली म खात हो उसी में छेद ऋरना चाहते हो ?*
चौधरी जी मैं कसी को थाली म नहीं खाता इसलिए छेद करन का सवाल ही नही उठता ॥! काली ने बहुत गम्भीर स्वर में क्हा।
काली के इस उत्तर से चौधरी चकक्रा गया । जाज तक उसके सामत दिख्ली कमीन या चमार ने इस ढग से बात नहीं की थी। उसे क्रोध ता बहुत आया लेक्नि अपने भाप पर वादू पाता हुआ बाटा
घरतो धन न अपना
दया, आपस म प्रम प्यार से रहा। तुम्हारी कौत सी जायाद साँसी है जो तुम एडत हो । बाली वुछ दर ये! एिए धामोग पडा रहा भर पिर नप्मा से बाला चौधरी जी आप पह तो छपड सा मिट्टी पोल स। छप्पड रायया साँता है। उया पमीन या चमार--यया जाट क्या मरा जन जितनी जी घाह मिट्टी पोद एता एविन इतना स्थाल रखा शि बहां चहुत गहरा गडढ़ा न बन जाए । पार साल ऊँचे मुहत्त व पुरण सिंदू त वहाँ कुआँ सा खाट टिया था। बरसात में छज्जू शाह वी भस उसम एसी फ्सी थी कि उस बत्टियाँ देवर निवालना पढ़ा । चौधरी न वाली वी आर देसत हुए बहा । बुछ क्षणा बे बाट वाली हाथ मटता हुआ बोला अंब जाऊे ?ै! चौधरी ने सिर हिटावर जान की अनुमति दत हुए कहा मरी वात याद रपना | दगा फ्सिद वरोगे तो नुकसान उठाओआगगे | बाली ने ढोई उत्तर नदिया और वदगी करके कमर से वाहर निकरए आया | मगू दीवानखाने दे! चयूतरे की सीढिया पर बठा था| वाली को देखवर वह नज़रें बचाकर वरामद की ओर चला गया | चौधरी ने मगू वो आवाजें दा तो वह जलती से कमरे मे घुस गया | फिर चौधरी की कडक्टार आवाज गूजी कुत्ते की औलाद तुन घोडी को खुल्ला क्या छोड टिया था। कोई ले जाता तो कया तरा बाप इतने स्पय भरता ? वुत्ता चमार हर बात निराली बरता है। चौधरी को गरजते सुनकर काली एवं क्षण के! लिए रुक गया। उसे चमार के शदा से बहुत चिढ थी । उसने फाटक को ओर बढत॑ हुए निणय कर लिया कि वह चौधरी हरदव की माल्शि करत क॑ लिए कभी नही आएगा । काली हवेली स सीधा छप्पड वी ओर चल्य गया। वहाँ जीतू मिट्टी उखाड रहा था। उसे देखत॑ ही जीतू ने कुदाल छोड दी और काली की ऑर बढता हुआ वबचनी से बोला क्या पुलाया था चौधरी ने ? वही मगर वाली वात थी ? काछी न वेध्यानी से उत्तर दिया । दया कहा उसने ? कोइ खास बात नहीं हुई उल्दा मग्रू को याद पड गई। काली बहुत
घ० घरती धन न अपना
उदास और त्रुद्ध स्वर म बोला मणशु के साथ बात बरत वक्त चौपरी उसे कुत्ता चमार ज़रूर बहता है ।' और वया उसे राजा साहय कहरर पुवारता ? चमार वह जम स॑ है और बुत्ता अपनी वरतूता स बन गया है / जीतू ने हँसते हुए बहा जीतू हवेली म हुई बातचीत का विस्तार पूछ कर बारी से थोरा अच्छा बाबू यह बता तूने मगु वो वहा पटया था ?' भ््या रा मैं उस जगह पेशाब फछूंगा ) एसी बात मत बहा । आखिर वह भी हमारी तरह कुत्ता चमाद हैं ४ वाली ने इृत्विम गम्भीरता मे कहां । काली ने अपनी वभीज और चप्पल उतार कर एवं आर रख दी जोर कुदाल उठारर मिट्टी खोदत छगा । जीतू एक ओर खडा होरर उससे बाटा मुहस्ले में निवक और प्रातो ने मशहूर कर दिया हे दि तून मगू वी बाँह् तोड दी है और तुझे थाता पतंडकर ल जाएगा । अव मैं इधर आ रहा था तो जस्सा बरी के नीचे खडी त्तरा रघापा वर रही थी । प्रीठो भी उसनी हाँ मे हा मिला रही थी ।' बाली ने कुटार रोक दी ओर उत्तेजित स्वर में बोला 'चावी । जीतू न काली को टोकत हुए कहा चाची लड़ कम और रा ज़्यादा रही थी । उसे प्रीतो म॑ विश्वास दिला दिया था कि तुम्हे थाना पकडने था रहा है ।' काली कुछ क्षणा तक साथ से डूबा रहा मौर फिर जीतू स बोच तू घर जाकर चाची को समझा दे कि मुझे थाना पकडने नहीं आ रहा है । जस्सा स॑ कह दता कि मगू की वाह नहां टूटी है-ओर वह चोधरी क कुत्ते की दोना हाथा से माल्शि कर रहा है । जब काला और दीनू छप्पड से निवल तो सूच अस्त हो रहा था। वह घर. पहुचे ता मिट्टी वे' ढेर के पीछे दीपक का मद स॒ प्रकाश फरा हुआ था और मिट्टी के ढेर का साया छांटी सी पहाडी वन गया था। काली न गधा की पौठ स॑ मिट्टी के वीर वीचे फेंके तो दीपक वी बत्ती एक्ल्म बहुत ऊँची कर दी गई। वाली ने देखा दि दो जाख उस पर जमी हुई थी । ये आँखें उसने पहले भी देखी थी लकिन इस समय बे उस बहुत ही अजीब बडी धुली हुई सी प्रतीत हुई । चादी ने उठकर काली के सिर पर बारता किया और भाया चूमकर संधी
घरतो धन न अपना ५ घर
हुई भावाद्ध म बोली
बारा, मेरे तो प्राण निकल गए थे। प्रीगो ने सारे मुदत्ठ मे मगहूर गर दिया वि सूने मगू वी वाह सोद दी है और पाता तुम्ह परड़ने आ रा है ।
न भगू की बाँह टूटों है और न ही थाना मुष्त परडढन भा रहा है। काली ने तीसे स्वर मे बहा । भानो ने बहुत जोर से साँग छोडी जगे यह बहुत देर से उसबी छाती म अटरी हुई थी ओर तझी से गली मे दोष्ट गई ।
बाली चाची थी सब बाता को अनयुना बरता हुआ मिट्टी मे रिगरे हुए ढेरे समेटन एगा । उस पहली यार पछतावा हो रहा था हि मंगू बे साथ उसे झगड़ा वरना चाहिए था ।
पर
मवान बनाने के लिए कुछ आवश्यक' सामान जुटाने के बाद वाली ने बुनियाद खोटन का विचार विया । उसकी दाइ ओर वलू वा मकान था ओर वाइ ओर निक्क् का । काली ने जीतू की सहायता से बुनियादों के निशान लगा दिए ।
सबसे पहले उसने बन्तू और उसके पिता और माता चाननराम और ठाकुरी को बुलाकर उनकी ओर बुनियाद के निशान दिखाए और बहने लगा
आप अपनी तसलल्ली वर हें कि कही मैंने आपकी जगह तो नही घेर ही है ।'
उहनि काली की बात का बहुत बुरा माना और चाननराम अपना रोप प्रकट करता हुआ बोला
तुम कौन सी मुरावो की तकसीम कर रहे हौ जो ऐसी बात कहते हो । हम तो खुशी हुई है कि तुम्हारी पक्की दीवार के सहारे हमारी कच्ची दीवार भी खडी रहेगी ।
काली लण्जित स्वर म बोला
चाचा बइ छोग एतराज कर देत हैं। कभी-कभी तो इसी बात पर यगडा फ्सिद खडा हो जाता है । इसस तो यही अच्छा है कि सब मामला पहले ही सुल्क्षा लिया जाय ।
घर घरती धन न अपना
उनके जान वे घाद काली निक््कू के घर गया और उसे दुनियाद का निशान देखने वे' लिए कहा । निनक् तो चुप रहा लेक्नि उसकी पतली प्रीतो काली से तीले स्वर मे बोली काली, तू तो एसी बात कर रहा है जसे हम तेर शरीक हैं ।' निक््कू भी अपनी पत्नी की हाँ मे-हा मिलता हुआ सिर धुनने गा । काली हँसी मजाक मे निक्क् को घर से निवाल लाया और उसे बुनियाद के निशान दिखा दिए । 'चाचा, देख छो, निशान ठीक है ना ? कोई एतराज हो तो अभी बता दो निक्क् ने सिर हिलावर अपनी अनुमत्ति दे दी और घर वापस चला गया। उसके पीछे पीछे मगू भी गली म आ रहा था। वह निवकू के साथ उसके घर में घुस गया | काली म॑ यह देखकर सोचा कि सबसे पहले निकक् थी दीवार वे साथ बुनियाद खोद ले । उसने जीतु वी सहायता से काम युरू कर दिया । अभी वह कच्चे निशाना का पक्का ही कर रहे थे कि निकक् सिर पर चादर रूपेटे कौर हाथ म॑ पतली सी लाठी पकड़कर काछी के सामने आ खडा हुआ और रोब से बोला मैं यहा बुनियाद नहीं खोदने दूंगा । थह मेरी जगह है । काली चकित-सा उसकी ओर देखता हुआ बीला 'चाचा, जब मैंद तुम्ह निशान दिखाए थे ला उस समय तो तू चुप रहा। अब मैंने बुनियाद खोदनी शुरू वी तो सिर पर चादर बाधकर झगडा करने भा गया है । निक्यू निशान छगी जमीन पर पाव रखता हुआ बहने रूगा यह जगह मेरी है। मैं इस जगह बुनियाद नहीं खोदने दगा। चाचा, इस तरह शार मचान से क्या प्ामदा । धीरज से बात कर। काली न॑ बुदाल फ्रेंफ्त हुए पहा । मेरी जाए चली जाए परतवरा नही लेकिन में तुम्ह यहाँ बुनियाद नही खोदन दूगा ।/ शोर सुनकर कई स्त्रियां अपने धर से बाहर तिवल आइ | कुछ काली के घर के सामने इक्ट्टी हो गई । हजूम के बतन के साथ-साथ बाली को परशानी भी बढन लगी। निवकू ने जब लेखा कि गली म कापी भीड़ इक्ट्टी हा गईं है तो वह लोगा वी सहानुभूति पाने व लिए हुधो हुईं आवाज़ मे वाल्य
घरती घन न अपना पे
काली के पास पसा है और चंह तगडा और जवान है तो इसका यह मतलब नहीं कि' गरीब और कमजोर पडांसी का हुक' मार ले मैं यही मर जाऊँगा लेकिन इसे अपनी जगह म बुनियाद नही खोदने दूगा ।! कालो भी गली म॑ खड़ी स्त्रिया को सम्बोधित करता हुआ बोला मैंने कच्चे निशान लगा लेने के बाद इनके सामन हाथ जोडकर कहा कि आकर निशान देख लो | यह तो चुप रहा लेक्नि चाची प्रीतो मुझे डाटने लगी कि मैं उतपर बेएतबारी कर रहा हूँ । फिर भी मैंने इसे यहाँ लाकर निशान दिखा दिए और इसने कोई एत्तराज़ न किया । अब छाठी उठाजर झगड़ा करने आ गया है ।' वाली निक्कू के पास जावर उसका हाथ पकड़ने वी कोशिश करता हुआ बोला 'चाचा मरी बात तो सुनो । निष्कू थटके से अपना हाथ छुडाता हुआ ऊँचे स्वर मे बोला जोरावर वा सात बीस दा सौ | एक तो मेरी जमीत खां रहा है और जब मुझे भारने पर भी उतारू हो गया है । निक््कू अपने घुटने को इस तरह सहलाने ऊुगा जसे उस पर सख्त चोट रूगी हो प्रीता जय तब चुप खडी थी लेक्नि निक्कू! को घुटना सहलाता देखकर वह बहुत ही तीखे रवर म वोली मोए काली को नई जवानी आई है | हर एक को मारता फ्रिता है। और फिर वह वाज् लहराती हुई वाली माए का प्लेग निवल--वाला ताप चढे--दर दर का भिखारी बने ।! चाची ने प्रीतां वा गालियाँ दत हुए सुना तो वह भी भडव उठी प्टय निकल तुझे और तरे धर वाल वा और तरे बच्चा वी फौज का जो सारा टिने घर पर व दर संघत फिरत हैं । भाना चाची य॑ पास खड़ी थी / वह उस चुप कराकर प्रीतों के धास चली गई और उसव मुह व आए हाथ रखता हुई बाी चाची मरत्ा वा झगडा है तू बीच म वया दखर दती है । राड मुत्त समचान बाठी तू बान है। आई है उसव साथ हमततीं करन । शाम हाती ता भाई बा मार का इतनी जलता न भूछता, ६ प्रीता न चना वा हाय अपन मुह से हटात हुए बहा। ना श्मिदानी पादे हट गई ।
छ्एं घरती घन न अपमा
जव प्रीतो ओर चाची का वोल-बोल्कर पस्तीता छूटनें लगा तो काली” चाधी का कधा धीरे से दवावा हुआ बोला
'चाची, क्या बोल रही हा झगड़ा तो यू चुरू कर दिया है जसे यहा खून हो गया हो ।
'खून कर दो । तुम्हारे सिर पर तो खून सवार है ही ! पल्ले चार पैसे क्या हो गए कि हर एक के पीछे छठ लेकर घूमता फिरता है। प्रीतो का जाघ क्षण प्रतिक्षण वटता जा रहा था। वाली के कहने पर चाची छुप हो गई थी। नानो ने जब प्रीतो को गालिया देते सुना तो वह उसे चुप बराने के लिए उसनी भोर गइ | उस अपनी ओर आती देख प्रीतो चीखती हुई बीली
राड वाराने पाल रही है । उनकी तरफदारी तो ऐस कर रहा है जसे मकान बाली का नही, इसी का वन रहा हो ।
नानो बुदबुदाती हुईं उल्टे पाव वापस आ ॥ई । काटी क्रोध से आग बंगूछा हो गया लेकिन बहुत सी स्त्रियां को उपस्थित देखकर छुप रहा। चाची से चुप न रहा गया । वह प्रीतो की ओर बढती हुई बोली
पहले तू अपनी खाट के नीचे तो झाककर देख । लुच्ची राड अपने मापकों खानदानी समझती है ।
शोर सुनकर ताइ निहाछी भी वहा आ गई । जीतू को काली के पास खडा देखकर वहू डर गइ । वह घबराई हुई सी जीतू के पास गई और उसका बाज पकक्डकर बोली
काका चल यहा से । तू खामुखाह क्या झगडे में पडता है । मा, यहा डाग नही चल रही । जा घर जाकर बठ ।' जीतू ताई निहाली को पीछे धकेल्ता हुआ बोडा ।
काका साडो की छडाई म॑ तू खामुखाह मारा जाएगा। मुझसे थाना क्चहरिया नही भुगती जाएँगी ।
जीतू भे ताई मिहाली की ओर धूरकर देखा और वहुत तीफे स्वर मं बाला
मेरे पीछे-गीछे सारा दिन ऐसे घूमती रहती है जसे में दा साल का बच्चा
हूँ ।' जीतू ने ताई निहाली को झिडर दिया । ता वह देंधो हुई आवाज़ मं बोली
यह तो मरी जान का दुश्मन हो गया है ।' ताई निहाली चाची प्रतापी के- पास आयरर बोली
धरती धन ने अपना
प्रतापिएं, तू ही इसे समझा ।' प्रीतो ने ताइ निहाली और प्रतापी को इकटठ देखा तो जीतू को भी गालियाँ देती हुई बोली रॉड वा पुत्तर सौदागर वा घोडा कभी सीधी राह पर नहीं चल्ते। क्या तू पहली मार भूल गया जो इस तरह फ्रि अवडन लगा है। मुशठडा कहा क््त। तेरी शराफ्त वा भी मैं अच्छी तरह जानता हूँ। जीतु ने बहुत छुद्ध स्वर म॑कहा | तू ओरता की लडाई म॑ क्या बोलता है। वाली ने जीतु को डॉटते हुए क्हा। जीतू कुदारट उठावर निवकू का ओर बढता हुआ बोला इस तरह काम हाने से रहा । यह तो जूते का यार है । निक्कू ने जीतू को अपनी ओर आते देखा तो उसे लल्कारता हुआ बोला हिम्मत है ता आगे आ। तरे टुक्डे कर दूगा। रा का पुत्तर अपने आपको थडा झाट साहब समतचता है । जीतू न निवक् यो मोटी सी गाली दी और उसकी ओर बटा लेकिन काली न उस अपन बाजुंआ में जज डिया। जीतू होश वर । भीता जीतू वा यह रग देखकर और भी झ्याशा भड़क उठी दरा कुछ न रट । रन तुम्ह चढ़ती जवानी म उठा छ। त्तरी हेह भ कीडे च्ले। प्रीता वी गारटियाँ सुननर ता” निहारही भी जवाद मे गारियाँ दते छगी । चाची प्रतापी भा निहाटी था साथ मिट गई । प्रीता के साथ उसती युवा पुत्री शाएा भा मिठटी । वान पर आवाज सुनाई नहा द रहा थी। एसा छरूगता था उस पारा वातन वी व भायाने एफ साथ घर रही हा | थाना रायरा चुप बारान वी वाधिए यर रही थी। परत वह फिर धीता के पास आई ता यह उसने मह मे हाथ दती हद बारा खटा जा मर पाप से बरी बेटा था अपने भा वी हाज का सब साश्त मट्टा म मिचे गा है । शाना भा भव उठा और भ्रुद्ध स्वर म बाटा चाघधी रात सेमा? कर बाव कर ।
८६ घरतो घन मे म्पता
चाची प्रतापी प्रीतो की जोर लपक्ती हुई बोली दुनिया म लोक्लाज भी कोई चीज हाती है।तुम में वह भी नहीं। क्वारी लडकी पर लाछत ल्गात हुए तुम्ह शम नही बाती ? क्जरी तो है ही जा तेरी इस तरह तरफ्दारी कर रही है। क्या लउमती है यह तरी ? प्रीतो तुम्ह सारी दुनिया अपने जेसी नज़र आती है| तून तो हरजाई कत्तिया जो भी पीछे छोड दिया है ; तू वाहर मिसलती है त! दस मद तरे पीछे हांत हैं। तरी लडकी निकलती है तो बीस उसे पीछे हाते हैं । भगर तू भच्ची बातें सुनना चाहती है तो आज सुन ले ।' चाची प्रीतो का मुह चिढाती हुई बोली तू अपनी करतूतें बहुत जल्दी भूल गई है । आज वे चौधरी तुम्हें खटकने लग हैं जिनके घर म सारा सारा दिन पडी रहती थी। तू ता वाजीग रो के कोठा म भी पहुँची । प्रीतो ने चाची को साथ ही दस-बीस गालिया सुना दी । तू नत्था्तिह की जो तू ऊँचे मुहल्ले वाले खडगस्चिह पी रखेल तू वावक् वो छाएा चमनलाल वी लुगाई तुने अपने गाँव वे जवान तो क्या, आस-पास के गाँवों के बूढे तक् न छांडे | तुम्हें तत जब भी शम नही आती | दस बच्च। की मा वन गई है लेक्नि तेरा तल सुर्मा और कधी पट्टी जब भी हौकरिया जसी है। चाची वाजू लहरा-लहराकर बोर रही थी और उसके' मुह से भाग वहन रुगी थी। प्रीतो भी लडाई मं अपने आपको भूल गई थी। उसस्ता दुपट्टा सिर से खिसक्कर पाव मे जा पडा था। क्मीज़ के वटन खुल गए थे । उसवे छोट बच्चे सहम हुए उसकी टागा स चिपट गए थे। थे एक्-दूसरी को अनाप शनाप बक रही थी । गाव का कोई जाट ऐसा नहीं था जितका इस ल््डाई मे जिक्र ने आया हां। काटी और जातू जपनी वददीयत के बारे मे नये तये ब्योरे सुनकर श्म के मारे ज़मीन मे गडे जा रहे थे । निककू भी गदन झुद्गाकर जमीन पर बठ ग़या था । वाली ने जब दखा कि बात औरता वी जात से उठकर बच्चा और बडा तवा आ पहुची है ता वह चाची व सामने हाथ जाडता हआ बोला चाची वस कर | क्या छोगा का तमाशा दिखा रही हो ।' चाची चुप होने की वजाय और भी ज्यादा जार से दौनन लगी । उसका साँस फूल रहा था। बह काली को एक आर हटाती हुई बोली
घरती पन भ अपना
ज्ावा, परे हट जा, रोज रोज वा करेश अच्छा नही हाता । आज इस रॉ” से फसला क्रवे' ही रहूँगी ४! बाली ने चाची वा यह रूप पहले कभी नहीं दा था। बहू भागवी तरह दहया रही थी । वहु उस पर्रडपर पीछे रू आया और अपन घर से दूर चौगान वी ओर ले गया । चाची पीछे मुड मुडकर प्रीतो को बरायर गालियाँ दे रही थी । वई स्त्रियाँ चाची के पांछे चली गइ। प्रीतो बुछ देर तक ता पूर जोश से वोलती रही टेविन मुवायले' म कसी वा न पार उसका जोश ठटा पडने लगा। काली चाची को चौगान म॑ छोडकर सीधा प्रीतो बे पास आया और उसवे सामने हाथ जोड कर सिर झुकाता हुआ बोला 'चाची, मैं तुम्हारे पाव पडता हूँ । तेरे सामने सिर झूयाकर बढ जाता हू ! तू मेरे सिर पर सौ जूते मार कर एक गिते। सारे गाँव की राख मरे सिर मे डाल दे लेक्नि यह तमाशा बाद कर दो। मैं तुम्हारे पुत्तर कः समान है । मेरे प्राण भी ले लो तो मैं ऊफ नही करूँगा । काली प्रीतां के पाव की ओर झुका तो बह पीछे हट गई । यह क्या कर रहे हो ? प्रीतो ने पीछे हटते हुए कहा | काली की वाता ने उसके अदर ममता वी भावना जया दी थी। चाची छाव म आ जाओ धूप म॑ खरे रहकर कसा हाल कर ल्यि है। बाजी ने दुपट्टा उठाकर उसे साफ किया और प्रीतो के हाथ में थमा लिया । जीतू को काली पर प्रोध आने छगा और वह मुह ही मुह मे बुदयुल्ाया इस चुडल के पाव पड रहा है कुदाल उठाकर इसके सिर पर नही भारता। उसने घणा से मह दूसरी ओर फेर लिया । प्रीतो ने निक्कू की ओर देखा जो सिर ल्टकाए हुए खडा था| फिर उभक्षा ध्यान बच्चा वी ओर गया । आसुआं से उतवी गाला पर ककीरें सी बन गई थी । काली न आवाज़ देकर सब को अपने पास बुलाया और उनके सिर पर हाथ फरता हुआ बोला रो राकर बंचारो के चिडिया जसे पतले-पतठ मुह निकल आए हैं । वच्च मासूमियत स॑ काली वी ओर देखने छगे । बच्चा का यह हुलिया देख कर प्रीतो का भी दिल पसीज गया और उसने सबको अपनी टागो से चिपक्षा ल्यिा। काली निक्कू क॑ पास जाकर उसके सामने हाथ जोडता बुआ वाला _ चाचा अपनी जिट छोड दो । मैं सब काम तुम्हारी मर्जी क॑ मुताबिर ही करूंगा । जहाँ कहमग वही बुनियाद खादूंगा और अगर क्हाग तो मकान बनाना
जप धरती धन न अपना
ही छोड दूंगा । लोगा को बहुत तमाशा दिखा चुके हो ! जव उठो यहाँ से ।' काली क॑ ये शद निकझू पर ठडे पानी की धार वी तरह पड़े । उसके मुह से एक शब्द तक ने निकला । काली ने दीवार वी छाव मे खाट पिछा दी और निक्कू को उस पर विठा दिया । एक बच्चे से पा मेंगवाक्र उसे हवा करन एगा । प्रीवो भी उनके पास आ गई । बच्चे भो खाद के चारा ओर जमा हो शए । वाली ने सयको घडे का ठडा पानी पिलाया । काली ने जब दखा दि निक््कू और प्रीतो शान्त हो गए हैं तो वह दोदा को पसे से हवा ररता हुआ बाला चावा अव बता, तुम्हें ऐतराज किस बात पर है। अगर पू चाह ता मैं एप हाथ अपनी जगह तेरा दीवार की आर छोड देता हूँ। ऐेक्नि यह सोच छा कि धरसात मे दोना दीवारें पानी भरने से बोदी हो जाएँगी। जौर गिर जाने का डर रहेगा ।' निवेक ने उसे कोई उत्तर न दिया तो वह प्रीतों से बोटा चाची, तू ही बता द। चाचे को शायद कुछ सूथ नही रहा है । 'मैं क्या बताऊँ। मर्दों की बातो मे मैं सलाह देने वाली कौन हीती हू ?! प्रीता ने ऐँठत हुए उत्तर दिया । वाली निककू का समसाता हुआ बोला चाचा, कच्ची दीवार बहुत मोटी होती है । पक्की दीवार तो उत्तनी मोटी बनेगी नहीं | तुम उठकर देख लो मैंने तुम्हारी दीवार से मिट्ठी का एवं छिलका तब नही उठरा है निक्य किर भी चुप रहा तो काली प्रीतो से कहते ढूगा चाची तू पूछ कर बता दे | चाचे को शायद मद साथ वात वरना पसद नही है । प्रीतो निक्कू को डाटती हुई घोली अंब बोलता क्या नही ? क्या जनान गोता खा गई है ?! निकर ने अपना चेहरा ऊपर उठाया | उसदे हाढ फडफ्डाएं और वह हारी हुई आवाज मे वाल्य मुझे पहले एसा छगा था कि तूने मेरी आधी दीवार भी काट दी है।' एक बार फिर अच्छी तरह देखभाल क्र अपनी तसाली वर लो।' काला मेवता। निक्ए जप चुप वेट रहा त्ता काली प्रसन भाष से बोला या मुर्खा इतना समय बरगद वर ल्या । न बोई बात भरी और न ही उसका कोई सिर पर ।
धरतों घन ने अपना घह
पाली न मुंगपरात्त हुए प्राता से पडा याची भरा तूत मुश दइगी गारियाँ दयाहा। गया तू सयशझुध लिप मेगा युरा चाहती है ? भी तरा बुरा गया चाटूँगी। तु तो मुभे अपा और” भे॑ भी झ्याता प्याग है । आता ये झिग्ध रवर मे पट्टा । तो फिर मु हतनी गारटिएाँ गया ट 7 तू अपन चाय 4 साय द्वागड जा रहा घा। औरत वा अपत आात्मी वा लद ता होता ही है। मैं भी बोर पा | फैन चाच रा बब क्षगड़ा गिया है ? पूछ छो उसस्त ? मैंने तो उसेरो ऊया प्रा तब पही बोला । यह तो पिछर्गू है। तभी न पढ़ा धिया तिया होगा सिर पर चाटर बाँध और छाठी उठावर जब यह घर रा विवटा तो मैं समनी थी कि घही काम स॒ जा रहा है। एक्न मु्चे कया पता था वि यहाँ जायटादे बॉँटां आया है। प्रीतो क्राहती हुई बोली पता नहीं बहू टिन वव आएगा जब यह की वाम पर जाएगा । पाली कुछ देर जुप रहवर फहन टगा चाची, अगर फ्हों तो वाम 'ुर कद दूँ । प्रीता निवकः वी ओर दंयने लगी । जब वह छुप रहा तो तीले स्वर मे बोली 'तू भी मह से कुछ वोछ ) फि्रि घहें काली स कहने लगी यह तो गूगा हो गया है । प्रीतो न एक बार फिर निक्क स सस्ती से पूछा स्तो वह भरी हुई आयाज मे बोला में क्घ रोकता हूँ ? त्तेरी जगह है तू तरस जी चाहे उम्र खोद । थोडी दर थे बाल निषक और प्रीतो अपने घर चले गए । काली और जीतू ने कुदालें उठा ली। जीतू अपनी कुदाल को मजबूती से थामता हुआ बोला पहले निबकू वी दीवार के साथ वुनियाट योद ने । इसका बोई भरोता नही है। यही घडी मे सेर और पल मे माशा हो आता है। काली जीदठू की ओर भ्थ् एप बजरः से लेएता हुआ बोला तू ठोक कहता है । पता नही फिर कब लाठी उठाकर आ जाए । काली और जीतू दोनो सिरो से एक्टूसरे केः साथ शत लगाकर बुतियाट
९ धरती धन न अपना
खोदन म व्यस्त हो गए और प्रीतो के बच्चे मिट्टी वे' ढेले उठाकर एक जोर फ्कन एगे।
१३
निक्कू और काली म सुछ॒ह सफाइ की खबर सुनते ही मंगू आग वगूला हो गया | वह लाठी उठाकर जूता घसीटता हुआ निकक दे घर आ गया। उस समय निक्क् सा रहा था । भगू ने निक्क वी टाग झेंसोडी तो वह हडबडाकर उठ घढा । वह वुठ क्षणा तक' मगू वी ओर देखता रहा और फिर #धी हु* भावाज मवोद
मगू बाजी चोपट ही गई । तरे कहने पर काम पर ने गया और उधर से कुछ न मिला । घर म आटे वी चुरकी तक नहीं है। पानी पो-पीकर सबके पेट मे अपारा पड गया है ।
कुत्ते वी औलाद, तू सारी उम्र भूखा रहेगा। तेरे जसे आदमी को तो पानी भी नसीव नहीं होना चाहिए। मगू ने क्डक्ती हुई आवाज़ म॑ कहा ।
मैंने क्या नही किया ? जिस जगह वाली ने निशान रूगाए थे वहा घरना मारपर बढा रहा। उसे गालिया टो जोर छलकारा लेविन वह जवाज़ म॑ मेरे सामने हाथ जोडता रहा । वह मेरी दीवार वी भार हाथ भर अपनी जमीन छोटते के लिए भी तयार हो गया ।
उसने तुम्हारे साथ धोखा किया है। तुमन वना-वनाया काम विगाद लिया । तुम्हारी जगह मैं हाता तो पाच दस रपये जरूर वसूल कर लेता। भगू निवक् वी ओर घृणा भरी नजरा से देखता हुआ बोला ।
मरुपय वा जिक्र सुनवर प्रीतो चार गइ 4 उसने सोचा कि काली का टक रुपया से भरा हुआ है। इसीलिए प्रतापी टिन में पचास थार उसका ताला टटालती है । वह मगू वे पास आ खड़ी हुई ओर निक्कू व मुह मे हाथ दती हुई बोली
इस माएं को तो सारी उम्र काम वरना न आया, अब्र कस जाएगा | लोग प्रिगडे खेल उना उते है लेकिन यह वना हुआ खेल बिगाड देगा है। मेरी तो
धघरतों घन न॑ अपना €१्
एगी विस्मत पूटी है जि रतापा भी नहीं मिरता । यह मर जाए तो घर मे एए नफ्र तो बम हो ।/ फिर वह भगू वी ओर मुड्ती हुई तीय स्थर मं बोटी तू नी तो इस सलाह दवार आप चौधरी वी हवेली घला गया | भगू न प्रीतो वी आर घूरवर दथा तो वहू फिर निकाय पर बरसन लगी मोया उछत्ता बहुत है । एक्नि पानी थी झाग वी तरह बढ भी जलती जाता है। वाली ते हा चार मीठी बातें वी ता यह उसकी बुनिया” तक घोटन पर तयार हो गया । यह सुनतर निवव भडक उठा और प्रीतों वी सात पुश्तों वो एक ही गाली म॑ पिराता हुआ बोला तु उस पुत्तर पुत्तर बह रही थी । उस छाती व साथ लगाने पर तुलो हुई भी मैतरी बरतूता वा भच्छी तरह समझता हू । मगू ने जब देखा कि वे दोता आपस मे ही उलचने लग है तो वह उह खामोश करता हुआ बोला 'टोकरी से गिरे हुए बेरा वी तरह अभी कुछ नहीं बिगड़ा है। अभी आधी बुनियाट खदी है। लोग तो अमारत बन जाने पर भी यगडा थडा वर देत है दीपहर ने बाद जब काली काम शुरू करने आए तो तुम पहले ही उस जगह खाट विछाकर बठ जाना । बाट मे मैं अपने-आप सभाल लूगा। मगू निक्क् वी भ्रतित्रिया जानने के लिए उसकी ओर देयनते छूगा। निफ्क् को मगर की बात पसद नही आई थी और वह उसकी ओर अविश्वास से देखने हूगा। वाली वे! साथ यगठे का ख्याल आता तो उसका दिल दहल जाता छैमिन जब रुपया की जोर ध्यान जाता तो उसको हिम्मत बेंध जाती । जब मगु न उसे' अंसमजस मे देखा तो उसको क्ध से झझोडता हुआ बोला तू मंद हैं मर्दों जसे वाम कर । यह तो सिफ बच्चा वी पलटन तयार करने के छिए ही मद है। बावी यह पिनका भी तोडेंगा तो इसकी वाह दद करने ज्गती हैं प्रीतो ने निवक् वा म्ह चिढात हुए कहा निक््क् न घूरवर प्रीतो की ओर टखा गौर हकलाता हथा बोला त जहता है ता एक बार फिर कर देखता हू । लेकिन तुम वहां रहना । लगर सुमन मटान मार लिया ता रात वो दारू (शराउ) पिलाऊगा । राय का नाम सुनकर निस्कू की जान मे जान आ गई और वह खाट से उह्ता हजा बारां
६२ धरती धन न अपना
अगर शाम तक खूदी हुई बुनियाद भी मिट्टी से न भर दी तो मुह पर अूक देना । पिक््कू भशु के सामते ही सिर पर चादर ल्पंटने लगा दो वह खुश ही गया और वार-वार खँखारता हुआ वदमस्त साँड वी तरहगली मआ गया। दिन दलने के वाद जीतू को साथ लेकर काली दुनियाद खालने के लिए आया तो निवक् पहले से ही सिर पर चादर बाधकर और हाथ म लाठी पकड़े हुए वहा बठा था | यह दखक़र वालो वा माया ठततव्रा छेकित वह मुसकराता हुआ नम्न स्वर भ वोटा 'चाचा, धूप म क््यां बठा है | उठ, तुम्हारी खाट छाँव मे बिछा दता हू । उसके नम्न शदा स निक्क् का हृढड तिश्वय कमज़ोर पहने रूगा लेकिन रुपया और शराब का स्थाल आने ही उसवी फ्रि से हिम्मत बेध्र गइ और वह सीखे स्वर मे बोला सबरे तुमन धोखे से आधी बुनियाद खोट ली है । भव नही खादन दूगा। जीतू भी काली वे! पास आ गया और उसे कघे स यक््आारता हना पूछने लगा चाचा निवच्यू दया बह रहा है २! काटी ने बताया ता वह हँसता हुआ निक्कू से बोला चाचा ववक्त का उट्ठा अच्छा नहीं होता । उठ, काम करने दे । निक््कू जीतू को मोटी-सी गाली देकर बाटा “चला जा यहाँ स कजर वी औरलाद | मेरे मूह लगा तो जमीन म॑ बिता शाड़ दूगा ।! वह खिल खिलातर हंस पडा और काली स बोला निक्गू चौधरी से तू आप ही बात कर | मुझे ता जमीन मे जिंदा गाड़ देने वी धमकी दे रहा है । काली ने निककू के पास जाकर बहुत गम्भीरता स कहा “चाचा, दया समय बरवाद कर रहा है । च” उठ यहाँ से मैं तुम्हारी तरफ आधा हाथ जमीन छीड दू गा । तू जगह छोडने बाला वौन है ? तरी हैसियत ही क्या है ? बान तो ऐसे करता है जस मरया का मालिक हा । निक्तर ने दाली दी सिल्ली उडाते हुए कहा । “चाचा इस तरह तो वे ल्ाग भी सगडा नहा वरत जिहे मरब्द बादन हात हैं। अगर तुम्ह यह शत्र है कि मैं तुम्हारो जमीन या रहा हूँ तो मुह
घरतो घन मन अपना ६३
वी पंचायत बुलावर फ्सला कर ऐ |
मैं बिसी पचायत वा नहीं जानता। एवं तो मरी जमीन खा रहा है आर उपर से धींस द रहा है। निवय् ने ऊँचे स्वर म॑ कहा |
उसवी आवाज सुनकर अपने दरवाजे वी जाट म॑ घडी प्रीतो बाहर निक्छ
आई और योली फछाकर काली का सयापा करने लगी । चौगान म॑ बरी के नीच बढी चाची प्रतापी को खबर मिली तो वह प्रीतो के सारे कुटुम्न को गाल्या देती हुई वहा आ गई | दोना के बीच लल्डाई घास म लूगी आग वी तरह भडकने छगी और पल भर म सारा मुहल्ला इक्टटा हो गया । मंद तकिय से दौडक्र वहा पहुँच गए ।
काली निवक वो खाट से उठाने की बोशिश करता हुआ बोला
चाचा तू यहाँ से उठ तो सही । मैं अभी तरे साथ फ्सला वरता हूँ।
अब यहा से मेरी लाश ही उठगी | निवकू उसवा हाथ झटकता हुआ बोला
सचाचा लाश उठे तो तेरे दुश्यता को। काली उस फिर उदाने की कोशिश करन लगा तो निक्क चारपाई व साथ पहले से भी ज्यादा सटकर बठ गया । काली न जब देखा वि निक्कू झगड पर उतार है ता वह बुद्ध स्वर में बाला
जा जाकर अपने ववीरू को बुरा छा । म उसके साथ बात वर टवा ।
वाली वी इस बात पर लांगा का भीड़ मे जोर का ठहाका गूज गया।
इतती दर म बाबा फत्तू भी वहा पहुच गया और निक्यू् वी खाट पर बठता हना वोरा
निककू जब तू बच्चा नही है । क5 को तरी लडरी वी शादी हो जाए तो साल-दां साल म तू दोहते-टोहती वाला हो जाएगा। अक्ट स काम लू झगड़े फिमाद म क्या रखा है।
'तू कौत है मर मामले मे दख” दने वाला ? बुडटा मरघट तन पहुच गया है लेबित क्षोधर स बाय नही आता । निककू ने बाय पत्तू वा खाद से धक्का दत हुए वहा | वह ग्रिरत लगा >क्िनि पास खड़ बलू न उसे सभाल लिया ।
मंद वी जबान वोई चीज होती है 4 सवर अच्छा भला मान गया था अर फिर घुतर रहा हैं| यह ता जत का यार है। बलतू न टाररा फल हए कहा । बई छागो न उमत्रा समयन किया। वहाँ मौजूद लागा वा अपने विरुद्ध दखरर तिकु घररा गया। लछविन ध्रौना उस होसछा दन व छिए गाट बी
बच्च व मूह से पिस्तान छुटावर बायू छहराती हुई गराशियाँ दन छगी।
ध्ड घरती धन भे अपना
जब वाबा फत्तू जमाने को कोसता हुआ वहा से जाने ढगा ता जीतू निक्कू के पास जाकर बोला चाचा भलमानसी से उठ जा वरना मैं खाट समेत तुम्हें गली म फक्र दूगा । निवक् ने गाली देते हुए जीतू वी ओर लाठी रूहराई छेक्नि काली ने भाग बढ़कर उसको सिर से पकड लिया और उसके हाथ से खीचकर एक आर फक दिया । 'चाचा तू एक झापड वी सार नही है। में जितनी नर्मी दिखा रहा हू तू उतना ही सिर पर चढता जा रहा है । निक्व् ने वाली की छाल आखें देखी तो नजरें नीचे सुका ली । वह सोच रहा था कि काली को उत्तर द॑ कि उसे मगू वी आवाज़ सुनाई दी । वह छाती तानकर बोला मैं अपनी जगह म॑ बठा हूँ मुझे उठाने वाला तू कौन है ?” काली निकक् की ओर बढने लगा तो मगू उसे ललकारता हुआ बोला 'खबरदार जा चाचे तिक्कू वी ओर कदम बढाया फिर वह उपस्थित छोगा को सम्बोधित करता हुआ बाला निक्क् को कमजोर जानकर हर कोई उस पर धथौंस जमा रहा है । मंगू की शह पाकर निवक भी शोर हो गया और खाट पर खडा हार बोला अगर कोई इस तरफ कुदाल लेकर आया तो गदन तोड दगा। प्रीतो भी निक्कू के समीप जा गई और गाद मे रो रहे बच्चे का चुप कराने के लिए उसके मुह म॑ पिस्तान दतती हुई चोली “अग्रर कसी न हमारी जगह वी ओर देखा ता खत पी जाऊँगी । काले ने जेब देखा कि वात हद से बढती जा रही है तो वह ॒कुदाल फेंक कर निक््क् के पास आ गया। चाचा, तू कसी की शह पर क्या झगडा कर रहा है २ अपना बुरा भरा आप सोच !' जीतू न भी निवकू को यही सम्मति दी तो मगू उस डाँदता हुआ वाला तू कौत है बीच मे वीौहन वाला ? बडा पच बना फिरता है। मा सारा दिन दर>र से भीख माँगतो है और बंटा लागा को सिक्यया (सम्मति) द॑ रहा है । तु वहाँ का पचर है? सारा दिन चौधरी दे जूते चाटता है और यहाँ आकर रोउ गाँठता है । क्या पिछली मार भूल गया जो फिर उछल्न लगा हू 7
धरतो धन न अ्षपना ६५.
जीतू | मर का मूँ धिशा। उपा जहा । मगू गाटियौं हया #भा हटी उकर जीतू वी भार बता रहित गाए होता मे थीम मे आ गया भौर मगू ना गांगा एव शातकर सादा हो गया । “मो पसगड्ा मरे और पान 8६ ६ मी सीण भे है। अगर स् हयाह हरा तो थायी सांग भी एमा शेर गे । #२ जगह भौधर मसला नह एवी । गैधर याते कर सहाय है जिय देग आता है । हैं हसूँगा या थी लग? में पा मे गे युतिया" घोाजा है । मैं खाशगा। करी । गुह्य5 उठा सी। जिररू ते उसी अपी आर आत हथा मो उसाय हि रह” गया और यह छाट से उठार एा थार जा पर #जा | गारठी व सार या पगौहार बुतिया" से पर हटा या जौर हाया पर धूरपर उमा एया ता कुचाठ प् दंगा धर पार सजदा रह । मंगू तिएर गो आर दयाता हुआ ऊँचे स्वस्म बोटा देय यथा रहा है ? आग बदढ्र उसे रोर दे ।' नियत अपना जग? पर ही घडा रहा तो मगु ने उसे बाली वी और पल दिया । पाली ने उस बाजू स प्रहार पीछे बर टिया | मगू ने एा बार फिर बारी यी आर धवया त्या तो निवत अपने-आपकोी सेभा5ऊ ने सती जौर हर परडाता हुआ पवरी इटा वे ढेर से जा टाराया | उसने जोर रा चीय मारी हाय में मर गया निक्यू को उठाया गया तो उसके माथे स घून वह रहा था। उसयो जझुमी देखवर सव राहम गए और धीरे धीरे खिसदने का यत्न वरने लगे । भौतो अपनी छाती पीटती हुई विलाप बरने लगी + माँ का 'रोती देखकर बच्चे भी रोने एगे। बाली न कुदाल फेंक दी और निक््यू को वहाँ से उठावर खाट पर लिटा टिया | वह नढाल था और उसके चेहरे पर पीलाहट छा गई थी। मगू अपनी छाठों पटवाता हुआ बोला अब यहाँ से भागता नहीं। मैं तुम्हें हृधकडी ल्गधावर ही दम लगा ।' यह वहता हुआ वह वहाँ स दौट गया । काली ने सरसो के तल मे हल्दी मिलाई और निक्क् के माथे पर रखबर उपर पट्टों वाध दी। उसके मुह मे पानी डाला | वह इृद ग्रिद मों औरता और बच्चा को पीछे हटाता हुआ निक्कू को पखा करने लगा । उसके' सिरहाने बढी प्रीतो कभी छाती पीटन लगती जौर कभी माथा । जब विसी ने कहा कि भगू थाना बुलान गया हैं तो चाची का दिछ घटने लगा और वह वैहाश हो गइ नानों ने उसके मुह मं पानी डालकर और नाक बद करके गशी तोड दी ।
६६ धरती धन न अपना
चाची ने आयें खाली और दहाड मारती हुई बोली 'हाय, मरे काली को जब घाना पतडकर ले जाएगा ।' बह फिर बहोश हा गई । उसका रग हल्दी वी तरह पीला हो गया । ओर हाठ एस वाद हो गए जस उह आपस म स्री दिया गया हा । निककू वी कराह प्रीता का विलाप, चाची थी वेहोशी कौर बारी वी घदराहट देखकर ताना वी आया से आँसू आ गए और उसके भूह से मगू के लिए बंद टुजा निकटी। बाली कभी चाची को होसला देता और वंभी निककू वा हाल पुछता। संगु चौधरी हरताम सिंह की हवेली जाता हुआ उज्जू शाह को भी खबर दता गया। उसन 'ास्त म॑ मिलने वाऐ हर ब्यक्ति वा बताया कि काशी न निषकू को भार दिया है. उसका खून कर दिया है। जिसने भी सुना वह अपने स॒व् वाम छांडतर चमादडी बी आर भाग गया। घांडी ही देर वाद मगू वापस आ गया और उपस्थित छोगा को छलकारता हुआ बोला यहा स कोई नही जाएगा । पचायत आने ही वाली है । भगू बड़ को ग्रालिया देता और बच्चा को डाटता हुआ पांछे हटाने रुगा । वह काली का नाम लिए बिना उस बतत ऊँची आवाज़ में घमकया दे रहा था। हक्नि वालो इनवो अनसुना करता हुआ निवकू को पखे से हवा करता रहा । मग न जब चौधरी हरनाम सिंह और छज्जू शाह को गली से आत्त देखा तो जांर जोर से बोल्न लगा 'चुप हो जाओ चौधरी जो था गए है । चौधरी हरनाम सिंह और छज्जू शाह वे पहुचन पर काली प्वा छोडक्र एक ओर खडा हो गया । चोधरी हरनाम सिंह ने निक्कू के माथ पर पट्टी और उसके उपर तैल मिले खूद का धवा देखकर करी वी ओर यू नजरें उठाइ जस उसे भस्म कर देना चाहता हो । जब से तू गाव म आया है चमादडी म शरारत बहुत बढ गईं है। पहले यही मुहल्ला था और यही लाग थे लछेक्नि इनमे से कोई कान मे डारने पर भी नही चुभता था । छेक्नि जिस दिन से तून यहा कदम रखा है रांज़ दगा फ्सिद होने छगा है। दभी किसी को मारता है और वी किसी तप सिर फोडता हं | काली न चोधरी की ओर भरपूर जाखा से देया और इढस्वर म कहने लगा 'शरारत पहल भी होती थी लक्नि लोग चुपचाप सहन कर लत थ। मैं उस समय छुप नही रह सकता 7 पानी सिर से गुज़रन रुगता है।'
घरतो धन न अपना &७
भाएी मे ये शब्ल शुप्ार चौधरी व) बहुत पाप भाषा छक्ित छज्मू शाह उसया हाय दवाता हुआ बोला वाणी शाह बात यया हुई है ? नियम बा गिरमेगझ पट गया ?' बारी उत्तर दन एगा तो मयू बाप में ही बौट परा | छग्जू शाहल उस टिडक टिया । उप रह, उसयी बात सुनन दे । बाट से तू भी अपनी सुना छगना | वाली ने पूरी बहानी गुनाई तो घौघरी पृणापूण स्वर में बाला एन क््मीना ये दिमाग मे रूर कोई कीड़ा होगा जो उस जमीन व लिए लड रहे हैं जो इनको नहीं है। आटमी विसी जायटाट मे लिए झगड़ा कर तो कोइ वात भी है। चौधरी जी, काली अपन आपको पूरे गाँव का माछिक समझता है। मगू ने आगे बढ़त हुए बहा । काछी उत्तेजित स्वर मे बोला मैं ज़मीन के इस टुक्डे को भी अपनी जायदाट नहीं समचता । मैं तो सिफ़ मल्वब वा मालिक हूँ। 'तू पूरे मलबे या भी मालिक नही है। यह मिट्टी गाँव वे! छप्पड की है । चौधरी का न्ोघ बढने लूगा तो छज्जू शाह ने फिर उसका हाथ दवा दिया। बाली अगर निवक् झगडे पर उतारू था तो तू चौधरी के पास जाता ॥ अपने आप जबदस्ती फसला करने की क्या कोशिश की ? शाह जी सवेरे यह बिल्कुल भात गया था । जिसस जी चाह पूछ छो । सच पूछो तो यह सारी शरारत मगू वी है । इसी ने निकक््यू को उकसा और भडकाकर झगड़ा खडा करा दिया और फिर उस इटा के ढेर पर धवका दिया और उसका सिर फोड लिया । यह झूठ है। यह निक्क् को गरीब और क्मजार समझकर उसका हक मार रहा था। इस भुहल्ले मे सभी गरीब है। मेरे कौन से हठ चलते हैं? काली न कहा । मगू बहुत ऊँची आवाज म॑ उत्तर दन लगा तो छज्जू शाह अपने काना पर दाता हाथ रखता हुआ बोला मगू जाहिस्ता बोल यहा सब कानो वाले खडे है। फिर वह चौधरी से कहने लगा निक््कू भी सिरफिरा है ! अपना नफा-मुक्सान आप नहीं सोचता । निक्कू खाट पर पडा कराह रहा था| उस विश्वास हो रहा था कि काछझी से उसे फूटी कोडी भी नहीं सिलेगी । वह खाट पर लेटा चौधरी के पाव की
ह्द घरतो धन न अपना
ओर झुकता हुआ बोला भचौधरी जी मैं मर गया । मेरा सिर फोड दिया [ प्रीतो विज्वप करती हुई सब बच्चो को चौधरी के सामत खडा करने' बोडी 'चौधरी जी, अगर तेरे चमार को कुछ हो गया तो इन छोटे-छोटे बच्चो वा क्या हाछ बनेगा ?! चौधरी हरनाम सिंह चुप खडा था | उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। उसे सारे मामले म काली का बहुत कम क्सूर नजर भा रहा था | बह वहा से चला जाना चाहता था लेक्नि कोई फसला क्ए विना जाता असम्भव था । वह वेजारी से बोला शाह, इन क्मीना को कसे समझाया जाय कि लडाई झगडे म कुछ नहीं रखा । छज्जू शाह बाबे फत्तू को देखकर बोला तू मुहल्ले का वुजुग है तू ही इह अवल दिया कर वाबे फत्तू ने अपने हाथ मे स पतछी सी लाठी जमीन पर रख दी और काना को छूता हुआ बोला 'शाह् जी निक्कू को तो रब जी भी नही समया सकता । मैंने इसे समझाना चाहा तो पजे झाडकर मर पीछे पड गया । वाकी रहा मगू वह मेरे साथ ऐसे वात करता है जसे मैं छ साल का छोकरा हू । इस मुहल्ले मे शराफ्त नहां रही । यहाँ अब लुच्चा लडा चोधरी और गूडी औरत प्रधान है। वावा फत्तू अभी अपनी बात पूरी भी न कर पाया था कि गली के मोड पर कसी के गालिया देने की आवाज़ सुनाई दी। उस आवाज़ को पहचानश्र छज्जू शाह मुमक्राता हुआ बोला घड़डम चौधरी आ रहा है । चलो, हम चले, मुतप्तिफ आ गया है। चौधरी हरनाम सिह ने कहा ' एवं पतला हूम्वा सा व्यक्ति हाथ में लाठी पक्डे हुए वहा पहुचा तो छांगा ने रास्ता दे दिया ) उसने कमर के गिद गज भर का साफा ल््पेट रखा था और सिर पर सफ्द पगडी बाध रखी थी | धडडम चौधरी वा असली नाम नत्थार्सिह है | क्यांकि बहू हर आदमी के काम में हस्तलेप करना अपना धम समझता है इसल्ए लॉग उसे प्राय धडडम चौधरी के नाम से पुवारत हैं । वह अपनी सव ज़मोन बचक्र खा चुका है। उसकी पत्नी विवाह क दो साल बाद वेऔलाद ही मर गई थी। नत्याभिह को कानून जौर क्चहरी दोना का बहुत शौक है। वाम हो या न हो वह हर दूसर तीसरे दिन क््चहरी जरूर जाता है |
धरतों घत न अपनों &६
झूठी सच्ची गवाहियाँ देश़र अपनी गुज्र-बसर बर रहा है। सर छोग उससे डरते हैं क्याकि वह मुहफ्ट है ओर युरी स-बुरी बात बहने से भी नही हिच किचाता । वह बूटो मे बठता है और जवाना म॑ भी, चौधरिया म॑ भी और क्मीना मे भी | इसलिए गाँव के बारे मे सबरे एयादा खबर उस ही रहती है । धडडम चौधरी को देखत ही प्रीतो दोहत्यड मारकर रो पडी । चौधरी तरे चमार वो वाली ने मार तिया । 'कौन वाली ?! घडडम चौधरी ने चारा बोर देयत हुए वहा । मासे वा लडवा धडडम चौधरी के जेहन म एवं तस्वीर उभरी और उसत्ी जगह एक दूसरी तस्पीर ने ले ली। वढ़ पाली को पहचानता हुआ बोला क्या ? तूने इसवा सिर फोडा है ” उसने निक््कू वी ओर सकेत करते हुए कहा । पता' है इसम॑ दफा ३०२ लगती है। बहुत बडा जुम है । सात साल की क्द हो सकती है |! यह सुनकर वहाँ खडे लोगो के दिरू दहुल गए | धडडम चौधरी वी कानून की सूझबूझ से विसी को इंकार नही था | वह बडे वकीछो के' कान क्तरता था । वह फिर बोला 'कद भी वा मुश्वकत जेल मे लोहे वी चक्वी पीसनी पडेगी । नानो ने यह सुना तो उसका सास जहाँ था वही रुक गया। वह ऊँची आवाज़ मे बोली निक्क का सिर वाली ने नहीं मगर ने फोडा है। इस आवाज़ को पहचानने "के लिए कई लोगो की नज़रें औरतो के जमघट की ओर उठ गई । धडडम चौधरी बोला यह बयान तो मौका के गगहे का मायूम पडता है । फिर वह मंगू की ज्ओर देखता हुआ बोला
तूने इसका सिर क्यो फोडा है ?
'मैंन नही फोडा । इसका सिर फोडने वाला उधर तहसीलदार वी तरह छाती चौडी करने खडा है। भगू न काली की थार इशारा करत हुए कहा ।
छज्जू शाह धडडम चौधरी को सारी बात बताने के लिए बोला
चौधरी नत्यामिह बात यू हई है कि |
छुप रह--वडा सफ्टपोश बना फिरता है। धड़डम चौधरी मे छज्ज
शाह का चिट॒क तिया । ०
०० घरती घन म॑ अपना
पहले मुझे दोण फरीका (पक्षा) की बात घुनन दो । छज्जू शाह अपनी श्लेंप मिटाने के लिए बोला चौधरी नत्याप्तिह, मैं दससे यही कह रहा था कि सुल्ह सफाई से काम लो गलत वात है । सुशह सफाई से नहीं कानून स काम सेना चाहिए वह छज्जू शाह की ओर घूरकर देखता हुआ वाला । छज्जू शाह ने चीधरों हरनाम सिह का हाथ पकडते हुए कहा चौधरी जी चला चलें । चौधरी नत्यासिह आ गया है। बहू इसका फसल करा देगा (' वे वहाँ से चले गए तो धडडम चौधरी ने जमीन पर जोर से थूक और निवक् से पूछने लगा 'तू उसे बुनियाद खोलने से क्या रोक रहा था ?* चौधरी यह मेरी जमीन दबा रहा था । तिकक ने रुधी हुई आवाज़ में वहां । जमीन दवा रहा था त्तो पटवारी के पास जाता | वह भाप कर तरी जमीन निद्ायल देता | सिर पर चाटर वबाधकर झगड़ा करने कया आया ? वुलवा दूँ पटवारी को ? मेरे पास पटवारी की पीस के पैसे नहों थे।! निककू ने सारा खेल चौपट होत॑ देखकर वावला करता शुरू कर दिया | फीस मैं दे दूगा । एक बार फ्सछा तो हो जाएगा। काली ने घड़डम चौधरी वी ओर देखते हुए कहा | बह दो ध्पये लेगा ?! उसने बाली को ध्यात से देखते हुए कहा जसेः उसवी हैसियत का अनुमान छूगा रहा ही । कुछ क्षण छुप रहने के बाद वह फिर बोला बसे तो इस वाम को कोई पीस नही है । लक्नि अगर पीस न दो तो पटवारी को कभी जरीब नहीं मिलती और कभी गाँव का नक्शा खो जाता है । काली न हाँ सम सिर हिंलाया तो धडडम चौधरी ने जीतू को पास बुलाकर रोब से कहा 'दोडकर पटयारी को बुला छाओ । मरा नाम लेदा । हाँ, उस वह देना कि साथ झरीव और गाँव वा नवशा लेता आए ! सब लागा वो पता था कि पटवारी इस कास बा एक रुपया लेता है लेविन घडडम चोधरो ने दा रुपया कहकर अपना हिस्सा भी पका